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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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इसके साथही साथ निवृत्ति ज्ञानदेवादिके पिता श्रीविठ्ठलपंतके दीक्षा-गुरुके विषयमें भी एक वाद है। निवृत्ति ज्ञानदेवके समकालीन संत नामदेव श्रीविठ्ठलपंतके दीक्षा-गुरुके विषयमें कहते हैं "श्रीपाद गुरु !" यह नाम तीन चार स्थान पर आया है। नाथ संप्रदायके दूसरे एक संत- ज्ञानेश्व- तरकालीन निलोबा कहते हैं "नृसिंहाश्रम" ने विठ्ठलपंतको दीक्षा देकर "चैतन्याश्रम" बनाया। संत नामदेव भी विठ्ठलपंतका संन्यासाश्रमका नाम "चैतन्याश्रम" कहते हैं। किंतु भारतीय अर्वाचीन कोशमें श्री र. भा. गोडबोले कहते हैं कबीरदासके गुरु श्री रामानंद श्रीविठ्ठलपंतके दीक्षागुरु थे ! इस पर अनेक विद्वानोंके कथनका विचार करने पर ऐसा लगता है कि ज्ञानदेवका जन्म कबीरदासके जन्मसे सामान्यतया १२५ वर्ष प्रथम हुवा था। श्री विठ्ठलपंतकी संन्यासदीक्षा इससे ३० वर्ष प्रथम हुई थी। इस दृष्टिसे विचार किया जाय तो कबीरकी दीक्षाके समय श्री रामानंद करीब १८० वर्षके रहे होंगे जो संभव नहीं दीखता। साथ साथ ज्ञानदेव और रामानंदके तत्त्वज्ञानका भी कहीं कोई संबंध नहीं है। महाराष्ट्रके विद्वानोंने अनेक दृष्टिसे विचार विनिमय करके इस बातको अस्वीकार कर दिया है! ऐसे करते समय महाराष्ट्रके विद्वानोंने, सर्वश्री हरिऔध, मिश्रबंधु, श्यामसुंदरदास, रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामकुमार वर्मा, पुरुषोत्त- मदास श्रीवास्तव आदि हिन्दी विद्वानोंके पर्याप्त उद्धरण दिये है और रामानंद और ज्ञानेश्वरके कालके अंतरके साथ ज्ञानदेवको विठ्ठलपंतसे रामानंद संप्रदायके सिद्धांतोंका जरा भी बोध न होनेकी बात भी कही है।

इसके अलावा और एक वाद है, और वह है ज्ञानदेव अथवा ज्ञानेश्वर एक ही व्यक्ति है या दो भिन्न व्यक्ति ! इस पर विद्वानोंने खूब लिखा है। इसमें योगी ज्ञानेश्वर और भक्त ज्ञानेश्वर ऐसा भेद भी किया है। इस पर परस्पर विरोधी ऐसा इतना अधिक लेखन हुवा है कि उसका उल्लेख करना भी कठिन है। उसमें दिये गये कई उदाहरण केवल विद्वानोंको ही शोभा देते हैं। साथ साथ ज्ञानेश्वरीमें कहीं भी विठ्ठलका नाम निर्देश न होनेका भी एक कारण है, क्यों कि ज्ञानदेवके अभंगोंमें सर्वत्र विठ्ठल है। किंतु नाथ संप्रदाय स्वयं योग और भक्तिका सुंदर समन्वय है और भक्त ज्ञानदेवके अभंगोंमें योगके अनेक रहस्य कहे गये हैं जिसके बीज ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतमें हैं। पू. विनोबाजीने “ज्ञानदेवाचे अभंग” इस पुस्तकमें लिखा है "ज्ञानदेवके इन अभंगोंके अध्ययनके बिना उनके योगका पूर्ण बोध होना संभव नहीं !” वस्तुतः योग और भक्ति परस्पर भिन्न है यह कल्पना ही अज्ञानजन्य है। योगी ज्ञानेश्वरकी ज्ञानेश्वरीमेंसे कई स्थान पर भक्तिका पवित्र झरना फूट पडता है तो भक्त ज्ञानेश्वरके अभंगों- मेंसे योगके अनेक रहस्य खुलते हैं ज्ञानेश्वरीमें जिस गवाक्षका पर्दा नहीं उठा है। किंतु विद्वान लोगोंकी तर्क शक्तीकी मोहिनी इतनी प्रबल है कि वह व्यास पीठपर एक ज्ञानेश्वरकी घोषणा करनेवालोंको भी खानगी बातोंमें “अभंग, ज्ञानेश्वरी लिखनेवाले ज्ञानदेवके नहीं हो सकते" कहनेके लिये ललचाती है।

अस्तु, इसके साथ ही साथ ज्ञानेश्वरी नेवासामें लिखी गयी या आपेगांवमें ? ऐसा भी एक वाद है किंतु ज्ञानेश्वरी की अंतिम ओवियोंमें जो ज्ञानेश्वरीका स्थल काल कहती है उस ओवीका एक एक शब्द लेकर, उसके साथ ही साथ नेवासा क्षेत्र महात्म्यके महालया महात्म्यके श्लोकोंको दिखाकर विद्वानोंने ज्ञानेश्वरीका जन्मस्थान नेवासा होनेका सिद्ध किया है। साथ ही साथ सैकडो वर्षोंसे वहांके एक शिवालयमें एक खंभा था जिसके पास बैठकर ज्ञानेश्वर ज्ञानेश्वरी कहते थे। आगे मुसलमानोंने उस जगह पर अपना स्वामित्व स्थापन किया और वहाँ नमाज पढने लगे। परिणाम स्वरूप शांतता भंग होनेकी नौबत आयी । १९१७ में उस सम- यके जिलाधीशने वह जगह सरकार जमा की। न्यायालयमें मुकदमा चला। अपील हुआ और अंतमें

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