ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानेश्वर महाराजकी समाधिके करीब तीन सौ सालके बाद एक दिन एकनाथ महाराजको स्वप्न हुवा । स्वप्नमें ज्ञानेश्वर महाराजने कहा “ अजान वृक्षकी जड मेरे गलेमें जा रही है। मुझे बडा कष्ट हो रहा है ! तू आकर वह जड निकाल । ” एकनाथ महाराज, साथ कुछ लोगोंको लेकर आलंदी गये । उस समय समाधिस्थान पर जंगल बढ गया था । इस स्वप्नके बाद एकनाथ महाराजने वह जंगल काटकर उसको साफ कराया । ज्ञानेश्वर महाराजकी समाधिका वह पत्थर खोला जो श्री गुरु निवृत्तिनाथने लगाया था । वे समाधिमें गये । अजान वृक्षकी जो जड ज्ञानेश्वर महाराजकी गलेमें लग रही थी वह निकाली । उसी समय ज्ञानेश्वर महाराजने एकनाथ महाराजको ज्ञानेश्वरीकी प्रति तैयार करनेका आदेश दिया और एकनाथ महाराजने उस समय उपलब्ध अनेक प्रतियोंकी सहायतासे ज्ञानेश्वरीकी शुद्ध प्रति तैयार की । ” महाराष्ट्रके भावुक ज्ञानेश्वर भक्तोंमें यह घटना आदरसे कही सुनी जाती है। साथ ही साथ ज्ञानेश्वरीका वही पाठ अबतक प्रचलित रहा है जो यह माना जाता है कि ज्ञानेश्वर महाराजके आदेशसे एकनाथ महाराजने संशोधन करके प्रचलित किया था । इस घटनाके कई सौ वर्षके बाद महाराष्ट्रके प्रसिद्ध इतिहास संशोधक श्री. राजवाडेको बीडमें ज्ञानेश्वरीकी एक प्रति मिली । उन्होंने अपनी ऐतिहासिक दृष्टिसे विवेचन विश्लेषण करके “ एकनाथ पूर्वकालीन भाषा होने से ” तथा “अन्य कई वैज्ञानिक कारणोंसे ” यही ज्ञानेश्वरीकी असली प्रति होनेका निर्णय करके उसको प्रकाशित किया । इस पुस्तककी प्रस्तावनामें इतिहासाचार्य श्री. राजवाडेने “ वह शा. श. १२१२-१२४० के मध्य लिखी गयी थी” ऐसा लिखा है। इसके बाद कई विद्वानोंने इसीको “ असली ज्ञानेश्वरी ” मानना और कहना प्रारंभ किया और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिसे ज्ञानेश्वरीका विचार होना प्रारंभ हुवा । परिणाम स्वरूप ज्ञानेश्वरीके विषयमें कई वाद निर्माण हुए । इसमें ज्ञानेश्वरकालीन भाषा तथा एकनाथ कालीन भाषाका भी एक प्रश्न था । इससे, प्राप्त पांडुलिपियोंका दो खंडोंमें विभाजन हुवा । एकनाथ पूर्वकालीन ज्ञानेश्वरीकी प्रतियां और एकनाथोत्तर ज्ञानेश्वरीकी प्रतियां । इन सब बातोंमें यहां यह बात ध्यानमें रखना अत्यंत आवश्यक है कि “सुदैवसे श्रीसच्चिदानंद बाबाकी लिखी हुई अथवा तत्समकालीन ज्ञानेश्वरीकी प्रति अब तक नहीं मिली, वैसे ही प्रत्यक्ष एकनाथ महाराजने अपने हाथसे लिखी हुई ज्ञानेश्वरीकी शुद्ध प्रति भी उपलब्ध नहीं है” वह नष्ट होते समय, उससे पहले, उसकी जो नकल बनाकर रखी गयीथी वही आज उपलब्ध है। ऐसे समय संभव है कि नकल करते समय बुद्धिदोष, दृष्टिदोष तथा हस्तदोषसे कुछ गलतियां रह गयी हों अथवा पाठभेद हुवा हो । आगे चलकर ज्ञानेश्वर भक्तोंने परंपरासे पैठणके श्रीएकनाथ महाराजके मठमें जाकर उनके घरमें बैठकर कुछ प्रतियां बना लीं; इससे आज उपलब्ध प्रतियोंमें कुछ प्रतियां श्रीएकनाथ महाराजकी प्रतिसे मिलती जुल्ती हैं तो कुछ इतिहासाचार्य राजवाडेजीकी प्रतिसे मिलती जुल्ती हैं। ई.स.१९०८-९ में राजवाडे प्रतिका प्रकाशन हुवा अर्थात् उसके बाद ही यह वाद चल पडा । अनेक विद्वानोंने “ वही प्रति सच्ची ज्ञानेश्वरी मान कर ” उसमें जो छंद नहीं हैं वे सब “ प्रक्षिप्त हैं ” ऐसे कहना प्रारंभ किया भले ही वे छंद मूल विषय और तत्त्वज्ञानका सुंदर विवेचन करते हों ! और परंपरागत-सांप्रदायिक ! -विचारवंतोंने राजवाडे प्रतिमें जो विसंगतियां या असंगतियां हैं उनका स्पष्टीकरण कर दिखाया ! और वाद बढता गया । आग्रहपूर्वक, तर्कशुद्ध या तर्क-कर्कश शब्दोंका पिरामिड रचा गया और सत्य उसके नीचे दब गया । एक प्रकारसे “ राजवाडे प्रति विद्वन्मान्य ज्ञानेश्वरी " हो गयी । विद्वानोने सच्ची ज्ञानेश्वरीके प्रकाशन के लिये सरकारके पास दौड लगायी । १७ ज्ञानेश्वर (३) १०७४