भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ३८ तो कर्म करने क्यों कहता है ७६ ६५ धृतिका विवेचन ५४२ ३९ त्याग ६३८ ६६ धैर्य ६४२ ३४० त्याग और संन्यासका ६७ नमस्कार भक्तिसे सद्रूप अर्थैकत्व ७१७ होते हैं २६७ ४१ त्याग भी तीन प्रकारका ७२३ ६८ नष्ट होना शरीरका ४२ त्याग वृत्तिका रहस्य ७२१ स्वभाव ही है ४७ ४३ दंभ ४८४ ६९ नाशवंत वस्तुओंकी इच्छासे ४४ दंभ ६४४ आराधना करनेवाले ही ४५ दम ६३२ अधिक २१४ ४६ दया ६३८ ३७० नित्य नैमित्तिक कर्मोंका ४७ दर्प ६४५ विवेचन ७१९ ४८ दान ६३२ ७१ निरहंकार निष्काम कर्म कर ८३ ४९ दिनरात मेरा चिंतन करनेवाला ७२ निराकार योगमार्ग ४०७ भक्त मुझे जानता है ४०८ ७३ निराग्रह वृत्तिसे जीवनयापन ४१६ ३५० दीन अर्जुनकी अनन्य शरणता ३७ ७४ निर्मल देह पक्व फलकी भांति ५१ दूसरे अध्यायकी प्रस्तावना ३१ अलिप्त होता है ७९५ ५२ दृश्य और द्रष्टाका अद्वयभाव ३५४ ७५ निर्विशेष तेरा वंदन कैसे करूं? ७११ ५३ देहधारीको कर्म अनिवार्य ७३० ७६ निष्काम एकनिष्ठ भक्ति ४८० ५४ देहाभिमान ४८९ ७७ निष्काम कर्मयोगीकी ५५ देहाहंकार आत्मबोधमें लय महानता १४० होनेके बाद ७४७ ७८ निष्काम भक्तसे मैं अत्यंत ५६ दैवी गुणोंकी महानता ६४३ प्रेम करता हूँ ४८० ५७ दोनों सेनामें केवल पांडव ७९ निष्काम भावसे दिये गये ही बचेंगे ३७९ शुष्क भोजनका आनंद १५४ ५८ दो भक्तोंकी भेंट आनंद ३८० नैष्कर्म्यका अर्थ आलस्य नहीं १३४ महोत्सव है ३०९ ८१ नैष्कर्म्य भावका दर्शन १३९ ५९ द्वंद्वचिंता छोडकर ८२ पंद्रहवे अध्यायकी भूमिका ५७४ स्वचिंतन करना ८०० ८३ परं दृष्ट्वा निवर्तते ६७ ३६० द्वैत गुरु शिष्योंके संवादमें ८४ परमात्माका मनोगत ३७३ अद्वैतके परेका अनुभव ६११ ८५ परमात्माकी असामान्य ६१ द्वैतस्थितिमें जाकर गुरुशिष्य उदारता ३४१ संवाद ८४० ८६ परिवर्तन देहोंका होता है ४७ ६२ धर्म-रक्षणके लिये ८७ पार्थका प्रश्न, कर्म त्याग मेरा अवतार ११० या कर्म योग ? १३२ ६३ ध्यान देने पर आनंद सिंहासन ८८ पावित्र्य ४६६ पर चढ़ते हैं २१६ ८९ पितृरूपमें गुरु वंदन २४८ ६४ धृतराष्ट्रकी जडताका दर्शन ८५४ ज्ञानेश्वरी ३०