भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ५४० विषयीको आत्म सुख नहीं मिलता ६८ ६३ शौच ६४२ ४१ विषयोंका स्पष्टीकरण ४१९ ६४ श्रद्धाका विविध रूप ६७६ ४२ वृद्धावस्थासे अनजान ५१२ ६५ श्रद्धा भी तीन प्रकारकी ६७४ ४३ वेद आज्ञाके अनुसार कर्त्तव्य कर्म ६६७ ६६ श्रद्धा हीन कार्य कभी सफल नहीं होता ७०८ ४४ वेद वादियोंके वाग्जालमें नहीं आवो ५९ ६७ श्रीकृष्णका अर्जुन प्रेम ३३० ४५ वेदोंकी कृपणता और गीताकी उदारता ८३९ ६८ श्रीकृष्णका भक्त-प्रेम ३३५ ४६ वेदोंको भी अगम्य ब्रह्मपद २५२ ६९ श्रीकृष्णकी भक्तवत्सलता ३५२ ४७ वैभव पूर्ण पूजनसे मैं किसीका नहीं होता २८२ ५७० श्रीकृष्णद्वारा इंद्रिय निग्रहका निरूपण १८१ ४८ वैराग्य ४७२ ७१ श्रीगुरूका सामर्थ्य २१२ ४९ वैराग्य और अभ्याससे अज्ञा-नको दूरकरना अधियज्ञ २५७ ७२ श्रीगुरूकी अवर्णनीय महिमा २९९ ५५० वैराग्यका लाभ और श्रीगुरूका लोभ ७९९ ७३ श्रीगुरूकी मानस पूजा ५७१ ५१ वैश्य तथा शूद्रोंका स्वभाव धर्म ७८२ ७४ श्री गुरूको वंदन १५४ ५२ व्यवहारिक अहिंसा ४४९ ७५ श्री गुरु निवृत्तिनाथका आध्यात्मिक वर्णन २९८ ५३ शरणागतिका विवेचन ८३३ ७६ श्रीगुरु निवृत्तिनाथकी महिमा ८६२ ५४ शरीरके मूल-भूत छत्तीस तत्व ४३६ ७७ श्रीमद्भगवद्गीता महिमा ५ ५५ शरीरके विषयमें भिन्न भिन्न विचार ४३० ७८ श्रोताओंकी ओरसे वक्ताका यशोगान १६४ ५६ शरीर नाशवान है ९७ ७९ श्रोताओंको ज्ञानेश्वर महाराजका उद्बोधन १०६ ५७ शरीर-भाव रहित आत्मा अधियज्ञ २२७ ५८० श्रोताओंको नमन ६ ५८ शरीर है जितना आत्मज्ञानभी अपना- ६०० ८१ संकल्पवादियोंकी दृष्टिसे आत्मानात्म विवेक ४३३ ५९ शांति ६३७ ८२ संकल्प-शून्य मन चैतन्यमय हो सर्व-व्यापी होता है १३५ ५६० शारीरिक तप सात्विक ६२८ ८३ संघात और क्षेत्र विवेचन ४४२ ६१ शास्त्रपूर्वक श्रद्धापूर्वक पूजनेवाले लागोंकी गति ६७३ ८४ संतका पावन चरित ४२२ ६२ शास्त्रोक्त निष्काम कर्ममें आत्मज्ञान मिलता है ७९० ८५ संतजनोंसे कविकि विनय ३३३ ८६ संतोंको ही आत्म-दर्शनकी शक्यता है ४५ ८७ संदेह विनाशका घर १२६ ८८ संन्यासकी परिभाषा-काम्य कर्मका त्याग ७१८ ८९ संन्याससे मूल अविद्या नहीं रहती ७३४ ज्ञानेश्वरी ३४