ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ९१ यह सुनकर अंधा धृतराष्ट्र १९ लोक क्षयके लिये आसुरी अंतःकरणसे भी अंधा रहा ३३१ लोगोंका जन्म है ६५३ ९२ यह स्थिति स्वयं प्राप्त ५२० लोक संग्रहार्थ कुशलता करनी होती है १५९ पूर्वक कर्म ९४ ९३ युद्ध परांगमुखता २३ २१ वर्ण व्यवस्थाके आधार भी ९४ युद्ध वर्णन ७ त्रिगुण हैं ७८३ ९५ ये सभी अध्याय मैने २२ वर्णानुसार सहज कर्म ही गुरु कृपासे गाये हैं २२६ अधिकार है ७८९ ९६ योग-ज्ञान व्यवस्था ६३२ २३ वह भाग्य अर्जुनको मिला जो ९७ योग साधनाका प्रारंभ और किसीको नहीं मिला ३९९ ऐसे करना १६८ २४ वही प्राज्ञ इस परमात्म-पदको ९८ योग साधनाका पाता है ५९५ स्थान ऐसा हो १६७ २५ वाणीका तप सात्त्विक ६८९ ९९ योग साधनाका विस्तार २६ वास्तविक अहिंसा ४५० और परिणाम १७१ २७ विजय गया अब दूर ५६९ ५०० योग साधनामें आसन १६८ २८ विदेहावस्था में किये गये १ योगाग्निसे सतत उपासना १२० मुक्त कर्म ७४८ २ योगी आत्म-धर्म आत्मामें और २९ विश्वमें प्रत्येक बातका उद्देश्य देह-धर्म देहमें देखता है ६०३ होता है ७४२ ३ रहो हृदयमें सदा ५३० विश्वरूपकी अद्भुतता ३५० अनुरक्त मेर ६८ ३१ विश्वरूपकी भयानकतासे ४ राजस दुःखका लक्षण ७८१ विह्वल सृष्टि ३५२ ५ राजस ज्ञानका विवेचन ७५७ ३२ विश्वरूपके प्रत्येक रोम-कूप ६ राजसिक आहारका विवेचन ६८२ जड़में एक सृष्टि ३४३ ७ राजसिक कर्ताके लक्षण ७६७ ३३ विश्वरूपके प्रत्येक रोम-कूपमें ८ राजसिक कर्मके लक्षण ७६२ रूप विविधता ३४४ ९ राजसिक कर्मत्याग ७२६ ३४ विश्वरूपके प्रत्येक रोम-कूपमें ५१० राजसिक तप ६९२ वर्ण विविधता ३४४ ११ राजसिक दान ६९६ ३५ विश्वरूपके संबंधमें अर्जुनकी १२ राजसिक धृतिके लक्षण ७७५ जिज्ञासा ३५७ १३ राजसिक बुद्धिके लक्षण ७७३ ३६ विश्वरूपमें अनेक देवताओंका १४ राजसिक यज्ञका विवेचन ५४५ दर्शन ३४५ १५ रजोगुणीके लक्षण ५४५ ३७ विश्वरूप विसर्जन ३९८ १६ रजोगुणीका स्वभाव धर्म ५५२ ३८ विश्व ही मेरा घर ऐसी भावना ४२५ १७ रोगसे असावधान ४१६ ३९ विषय विस्तारके लिये १८ लज्जा ३४० निवृत्तिनाथका उलाहना १४७ ३३ विषयसूचि (3)