ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 52, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ४३ मानसिक तप सात्त्विक ६९० ६४ मैं उनका हो जाता हूँ जो मेरी ४४ मार्दव ६३९ निष्काम भक्ति करता है २८१ ४५ मुझ पर अपार कृपा कर मेरी ६५ मैं केवल निमित्तमात्र हूँ ४६६ रक्षा की ३३७ ६६ मैं गुरुकी कठपुतली हूँ ७ ४६ मुझमें मिलनेके बाद कोई भिन्नता ६७ मैं तो आँखोंसे दीखता हूँ ३०२ नहीं रहती २९० ६८ मैं भक्तोंके कीर्तनमें रहता हूँ २६५ ४७ मुझसे निर्मित त्रिगुणोंने मुझे ६९ मैं सबका संहार करनेवाला ढक दिया २०७ काल हूँ ३७७ ४८ मुझे जाननेके लिये इंद्रियोंको ७० मैं सर्वत्र हूँ यह विश्व मेरा अंतर्मुख करो ३०४ विस्तार है २५४ ४९ मुझे जाननेवाला कोई एकाद ७१ मैं सर्वव्यापी हूँ ३०८ होता है २०१ ७२ मैं सर्वव्यापी हूँ किंतु २१६ ५० मुझे निष्काम प्रेम चाहिए २८२ ७३ मैं स्वयं कर्मरत हूँ ८२ ५१ मूर्ख लोग हृदयको छोड़ कर बाह्य ७४ मोक्षके लिये स्वधर्ममें आस्था सुखकी ओर दौड़ते हैं २५३ अनिवार्य है ७९२ ५२ मृत्युके समय असहाय स्थितिमें ७५ मोह आंधीमें फंसकर भगवद् स्मरण होगा क्या ? २३४ तामांधमें ६५९ ५३ मृत्युके समयकी पहली स्थिति ७६ मोहग्रस्त धृतराष्ट्रकी जिज्ञासा ८ चैतन्य प्रधान २४४ ७७ मौन छोड़ कर गुढ़ गुण वर्णनके ५४ मृत्यु समयकी दो स्थितियां २४२ लिये क्षमा ६२६ ५५ मेरा चित्त हो श्रीकृष्ण ७८ मौन भूषणादिसे गुरु पूजन ७१२ गुण-वर्णनमें समर्थ ४०६ ७९ यश ६२२ ५६ मेरा वह परम पद ५९७ ८० यज्ञके भी तीन प्रकार हैं ६८५ ५७ मेरी भक्ति करनेका अर्थ सब ८१ यज्ञादिके आदि लेनेका कुछ मुझे समर्पण करना २९५ मंगलनाम ७०० ५८ मेरी भक्तिमें कुल जाति आदिका ८२ यह अध्याय शांत और अद्भुत बंधन नहीं २८९ रसका प्रयागराज है ३३२ ५९ मेरे शुद्ध रूपमें कल्पनासे विश्व ८३ यह अनुपम ग्रंथरत्न है ६८८ उत्पन्न होता है २५५ ८४ यह नहीं करना चाहिए ८४१ ६० मेरे स्मरण पूर्वक जो शरीर ८५ यह गीता आत्मज्ञानकी लता है ६२२ छोड़ता है वह मद्रूप होता है २२८ ८६ यह नाम शुद्ध पर ब्रह्म है ७०६ ६१ मेरे भक्तोंसे जो यह गीता ८७ यह विज्ञान है २०२ कहेगा वह मद्रूप होगा ८६६ ८८ यह शब्द ब्रह्मका नवनीत ६३८ ६२ मैं अंधोंके हाथमें पड़ा ८९ यह सब मिथ्या स्फुरण है मोति-सा हूँ २६४ उस मैं का स्वरूप ८१५ ६३ मैं अकेला सबमें भरा हूँ ६०५ ९० यह सब मैं ही हूँ अविद्याके कारण भिन्न दीखता है २३६ ज्ञानेश्वरी ३२