भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 55

क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ५९० संपूर्ण ब्रह्मांड ही विश्वरूपमें १४ सबको त्रिवेणी ज्ञानसुलभ हो भर गया ३४८ इसलिये देशी भाषामें ९१ संसारमें कुछ दुखी और कुछ यह घाट रचा ३३३ सुखी क्यों ? ५०७ १५ सभी अहंकारकी भूत ९२ संसार वृक्ष उन्मूलून चेष्टामें आते हैं २१० कैसे करना ? ५८८ १६ सभी प्रकारके मोहसे ९३ संसारवृक्षका पहला पल्लव ५७९ मुक्त मनुष्य २४७ ९४ संसारवृक्षका बीज और बड ५७७ १७ सभी साकार वस्तुओंमें ९५ संसारवृक्षकी कल्पना ५७५ ओतप्रोत अविनाशी हम २२४ ९६ सकल जन-जीवनका जीवन १८ सभी सुख दुख उसीमें लीन ७३ वैश्वानर मैं हूं ६०६ १९ सभी स्वभावके आधीन ८२४ ९७ सरकर्म तीर्थमें उज्वल होनेसे ६२० २० सम दृष्टिसे कर्म करना ७२९ सत्व-संशुद्धि होती है ७२४ २१ सम बुद्धिसे लड ५७ ९८ सत्भावसे होनेवाले लाभ ७०४ २२ समरस भक्तिकी अद्वयावस्था ८१७ ९९ सत्य ६३५ २३ समर्पणका रहस्य ८२१ ६०० सत्वको स्पष्ट करने रज तम २४ समर्पणका भाव ४६३ कहे गये हैं ६९८ २५ सरल बुद्धि जिज्ञासुके १ सत्वगुणके लक्षण ५४४ सम्मुख गुह्यका उद्घाटन २४२ २ सत्व रज तम इन तीन गुणोंके २६ सरल शब्दोंमें उपदेश दो ७७ कारण पुनर्जन्म ५४३ २७ सरस्वती वंदन २ ३ सत्व संशुद्धि ६३१ २८ सर्वत्र परमात्म दर्शनका ४ सत्वस्थका स्वभाव-धर्म ५५० सरल मार्ग १८४ ५ सदा विषय-सेवन ४९५ २९ सर्वत्र सभी तू ही तू भरा है २५६ ६ सन्मार्ग पर चलनेवालेकी कभी ६३० सर्वत्र सुखका वर्णन २७७ दुर्गति नहीं होती १९३ ३१ सर्वेंद्रिय मन वचन प्राणसे ७ सबका नाश करनेवाली मुझमें लीन हो ८३० दैवी शक्ति ३६९ ३२ स-संकोच विश्वरूप ८ सबका मूल आधार ५६९ दर्शनकी प्रार्थना ३३९ ९ सबके अज्ञानका कारण भी मैं ६०९ ३३ सहज नित्यत्व है अध्यात्म २२४ ६१० सबके लिये मेरा द्वार खुला है २१२ ३४ सातवे अध्यायका उप संहार २१९ ११ सबके हृदयमें जो आत्म ३५ सात्विक आहारका महत्व ६१८ स्फुरण है ६०८ ३६ सात्विक आहारका विवेचन ७५७ १२ सब कोई मुझसे ही ३७ सात्विक कर्ताके लक्षण ७६६ उत्पन्न हुए हैं ३०४ ३८ सात्विक कर्मके लक्षण ७६१ १३ सबको तेरे दांत पीस रहे हैं ३७३ ३९ सात्विक ज्ञानका विवेचन ७५७ ६४० सात्विक तप ६९३ ३५ विषयसूचि

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