ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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४१ & सात्विक त्याग & ७२८ & ५६ & सोलहवे अध्यायकी समालोचना & ६६९
४२ & सात्विक दान & ६९४ & ५७ & स्वधर्म अनादि और अनिवार्य है & ८४
४३ & सात्विक धृतिके लक्षण & ७७५ & ५८ & स्वधर्ममें मृत्यू भी श्रेष्ठ है & ९९
४४ & सात्विक बुद्धिके लक्षण & ७७२ & ५९ & स्वधर्माचरणकी अपूर्व स्वर्णसंधि & ५३
४५ & सात्विक यज्ञका विवेचन & ६८५ & ६० & स्वभाववादियोंकी दृष्टिसे आत्मानात्म विवेक & ४३४
४६ & सात्विक श्रद्धावाला शास्त्रोंका अनुकरण करता है & ६७७ & ६१ & स्वरूप विस्मरण ही अज्ञान है & ४३६
४७ & सात्विक सुखका विवेचन & ७७९ & ६२ & स्वाध्याय & ६३३
४८ & साधना अधुरी रही तो & १९३ & ६३ & स्थितप्रज्ञके लक्षण & ६५
४९ & साधनावस्थाका विवेचन & ८०१ & ६४ & स्थितप्रज्ञताकी जिज्ञासा & ६४
५० & सुख दुःखका स्वरूप & ५०० & ६५ & स्थैर्य & ४७०
५१ & सुख भोगकेलिये पापसे धन संचय & ६५६ & ६६ & स्थैर्य & ६४१
५२ & सुन कर स्व-अज्ञान जन्य मोह दूर हुवा क्या ? & ८४६ & ६७ & स्वैराचार & ४८७
५३ & सूत्र रूपसे पिछले नौ अध्यायोंका उप संहर & ३०० & ६८ & हरिकृपाका वर्णन & ३९
५४ & सेवाका मूल्य प्रसाद दान & ८६८ & ६९ & हिंसा & ४८५
५५ & सोलहवे अध्यायका समारोप & ६७१ & ७० & हे आदि अनादि पुरुष क्षमा कर & ३८८
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