ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगवाक्षमेंसे वेदसे वर्तमानतक, आसेतु हिमाचलका, मंगलमय पावन दर्शन कर सके इस उद्देश्यसे यह सब काम चल रहा है । प्रस्तुत अनुवादकको इसमें जरा भी संदेह नहीं कि उसमें यह योग्यता नहीं है । इस महान कार्य करनेके लिये वह योग्य नहीं । उसकी इस अयोग्यताका उसको पूर्ण ज्ञान और भान है । किंतु जो योग्य हैं उनको, उनकी योग्यताके अनुसार अन्य बडी बडी बातें करनी हैं । बडे बडे काम हैं। साथ साथ यह काम भी करनाही है । इसीलिये, कुछ मूर्खता होगी, अव्यापारेषु व्यापार होगा, छोटी मोटी ही नहीं हिमालयकी-सी भी त्रुटियां रह जायेंगी, यह सब मानकर ही यह काम हाथमें लिया है ! अर्थात इस महाग्रंथमें जो त्रुटियां होंगी, भूलें होंगी, अशुद्धियां होंगी उसके लिये विद्वान लोग उदारतासे अनुवादकको क्षमा करनेकी कृपा करेंगे ऐसा विश्वास है !
इस क्षमा याचनाके बाद, ज्ञानेश्वरीके वृत्तके विषयमें एक दो बातें कहना अनुपयुक्त नहीं होगा । इस वेदांत-काव्यका छंद स्वाभाविक ही मराठीका अपना छंद है। ओवी और अभंग ये दो वृत्त मराठी संत-साहित्यका हृदय और मस्तिष्कसे हैं। ओवी छंदमें, जहां परमामृत, ज्ञानेश्वरी, अनुभवामृत, स्वानंद-लहरी, दास-बोध जैसे वेदांत काव्य ग्रंथ हे वहां कृष्ण चरित्रके अनेक प्रसंग, भागवत, रामायण, श्रीकृष्ण चरित्र, भारत जैसे चरित्र ग्रंथ भी हैं और कवियोंमें सर्वश्री मुकुंदराज, ज्ञानेश्वर, एकनाथ, श्रीकृष्णदयार्णव, रामदास और मुक्तेश्वर जैसे महान कवि हैं। ये सब काव्य प्रासादिक और विद्वन्मान्य हैं अभंग और ओवी इन दोनो छंदोंके विषयमें मराठीके अन्यान्य विद्वानोंने जो कुछ लिखा है उसका सार इतना ही है कि वैदिक अनुष्टुप छंदसे प्रेरणा लेकर इस छंदकी रचना की गयी है। ये दोनों अक्षर छंद हैं। अभंग और ओवी दोनोंका रूप एक है। कुछ विद्वानोंने लिखा है “ओवियोंकी मालिकाको अभंग कहते हैं।” ऐसे विधान उन दोनोंकी एक-रूपता बताते हैं इतना ही । किंतु वास्तविकता ऐसी नहीं है। “अभंग” शब्दके विषयमें संत नामदेवने कहां है “सम चरणमें अभंग । नहीं तान छंद-भंग।” “सम चरणमें” ये शब्द सूचक माने जाते हैं। जो वृंदावनके त्रिभंगी कन्हय्या की भांति बेढ पैरसे खडा न जोहोकर “समचरण” विठ्ठल-खडा है वह “अभंग-विठ्ठल” है। अभंगके साथ विठ्ठल शब्द जुडकर अभंग विठ्ठल बना । ऐसे विठ्ठल भक्ति परंपराका यह छंद “अभंग” है। साथ ही साथ “दो सोल्ह छंदोंके सम चरण पर खडा अभंग” । ऐसा इसका पहला भाग कहता है। किंतु किसी अभंग गायकने अक्षरोंको गिननेका प्रयास कभी नहीं किया है। अनेक संतोंके अभंगोका अध्ययन करके कुछ निरुद्योगी (!) विद्वानोंने मोटे तौर पर इसके कुछ प्रकार दिखायें हैं और उनको अलग अलग नाम भी दिये हैं। ज्ञानेश्वरको महाराष्ट्र जैसा माउली कहता है वैसे ज्ञानोबा भी कहता है और ज्ञानोबासे विनोबा तक आध्यात्मिक महाराष्ट्रने अपनी इस अभंग-वाणीको अक्षुण्ण रखा है। इस प्रकार यह छंद पारमार्थिक महाराष्ट्रके हृदयकमलका “अभंग” सुगंध है और ओवी इससे भी प्राचीन छंद है। ई. स. ११२९ में भी इसका दर्शन होता है। उस कालके एका ग्रंथमें इस छंदके विषयमे लिखा है कि -
पीसते कूटते ओवियां गाती हैं जो महाराष्ट्रमें ।
और स्वनामधन्य लोकमान्य तिलकजीके विषयमें कहा जाता है कि वे सदैव कहा करते थे “चक्की पर बैठते ही ओवियां अपने आप सूझती हैं!” ओवीके विषयमें कभी किसीने, कभी किसीने कुछ लक्षण लिखे हैं किंतु वे कभी सर्वमान्य नहीं हुए हैं। जैसे सोल्हवे शतमानके एक साहित्यिकने लिखा है “ओवीके पहले चरण छ से आठ अक्षरके हों और चौथा चरण चारसे छ अक्षरका।” किंतु ज्ञाने- श्वरीमें ही पहले तीन चरण छ से चौदह अक्षर तकके हैं। पहले तीन चरणमें अंतिम प्रास होता २१ ज्ञानेश्वर