ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै और चौथे चरणमें प्रास नहीं होता । इस ओवी छंदके मूलके विषयमें ऊपर कहा गया है कि वैदिक अनुष्टुप् छंदसे प्रेरणा लेकर इसका विकास किया गया है। किंतु कुछ विद्वानोंका कहना है कि यह कन्नड त्रिपदीका मराठी करण है पर कन्नड त्रिपदी छंद संभवतः वैदिक गायत्री छंदका कन्नडीकरण हो ! कुछ भी हो, ये दोनो छंद कहींसे आये हों, पर ये मराठी संत साहित्यके प्रकाशस्तंभ हैं ! महाराष्ट्रके शान और भक्तिके अमृतस्रोत हैं। महाराष्ट्र सारस्वतमें ओवियोंकी संख्या लाखोंसे गिननी होगी। साथ साथ प्रत्येक कविका एक न एक वैशिष्ट्य है। ओवी सुनते ही मराठी साहित्यका जानकार झट कह सकता है यह ओवी किसकी है इतना वह वैशिष्ट्य सु-स्पष्ट है। ओवियां जैसे ग्रंथस्थ हैं वैसे कुछ कंठस्थ भी हैं। विशेषतया गांवोंमें स्त्रियां या लडकियां, पीसते समय, कूटते समय, लडकियां झूले पर बैठ कर झूलते समय, मातायें बच्चोंको पालनेमें झुलाते समय, या गोदमें सुलाते समय ओवियां गाती हैं जो आज भी सुना जा सकता है। ये ओवियां तित- लियोंकी भांति बहुरंगी और क्षणिक उडती हुई रहती हैं। इनके विषय अनंत हैं। महाराष्ट्रका दैवत पांडुरंग और उस पांडुरंगके पगले संत तो इन ओवियोंका विशेष विषय है। साथ साथ अन्य देवी देवता भी इनका विषय बनता है। माता-पुत्रका प्रेम, भाई बहनका प्रेम, आदिका सुगंध लेकर ओवी तितली खूब उडती है। पति-पत्नीके बीच भी यह घुस कर उन्हे हंसा रुलाकर दो तन एक मन कर देती है। अर्थात ओवी छंद महाराष्ट्रीय जन जीवनकी माधुरी भी है जैसे महाराष्ट्रीय आध्य त्मिक अमृत सागरके अथांग तरंग हैं। इस दृष्टिसे ओवी छंदसे परिचित होना सही अर्थमें महा- राष्ट्रके हृदयसे परिचित होना है और ज्ञानदेवकी ओवियां तो विशेष कर। क्यों कि मराठी साहित्यके मर्मज्ञोंका कहना है मोरोपंतकी आर्या , ज्ञानेश्वरकी ओवियां और तुकारामके अभंग मराठी साहित्यकी निधि है। इसलिये ज्ञानेश्वरीके इस अनुवादका एक वैशिष्ट्य है जो इससे पहले हिंदीमें अनुवा- दित ज्ञानेश्वरीमें नहीं था। जो विशेषतायें हैं वे सब मूलकी देन हैं और त्रुटियां अनुवादककी अपनी, आशा है विद्वान् और साहित्यके मर्मज्ञ उदारता पूर्वक इसकी क्षमा करनेकी कृपा करेंगे ! बाबुराव कुमठेकर.