भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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किंतु सही दिशा जानकर और दिशा जाननेके बाद भी, उस दिशामें कौन कौन गयें यह देख कर, उनसे राह पूछ कर ही किसी रास्ते पर आगे बढ़ना चहता है। इसलिये अनुवादकने “केवल विद्वानोंके विरोधसे बचनेके “भय” से अथवा अज्ञात भावसे अपना नाम असंप्रदायिक आधुनिक विद्वानोंमें लिखानेके “लोभसे” अनुवादके लिये जो “सरकार मान्य और विद्वन्मान्य” ज्ञानेश्वरी चुननेकी गलती की थी उसको सुधारा ! १५०-२०० पृष्ठोंके भाषांतरको गंगार्पण करके श्रीएकनाथ महाराज द्वारा संशोधित सांप्रदायिक ज्ञानेश्वरी लेकर पुनः “ॐ नमोजी आद्य” से श्रीगणेश किया। साथ ही साथ अनुवाद करते समय जहां कहीं अर्थके लिये संदर्भ देखना पडा वहां श्रीसाखरे महाराज तथा श्री शं. वा. दांडेकरजी द्वारा संपादित श्रीबंकट स्वामीकी ज्ञानेश्वरीको ही प्रमाण माना है ! वैसे तो अनुवाद करते समय अनुवादकके सामने श्री साखरे महाराज, श्री शं. वा. दांडेकर तथा श्री भिडेकी सार्थ ज्ञानेश्वरी रही है। किंतु अर्थ निर्णय करते समय अनुवादकने न तो स्व-बुद्धिको प्राधान्य दिया न श्रीभिडेके अर्थको किंतु श्री साखरे महाराज अथवा श्री दांडेकरजीके किये गये तथाकथित सांप्रदायिक अर्थकोही प्राधान्य दिया है ! अस्तु; इतना स्पष्ट लिखनेके बाद ज्ञानेश्वरीके वादके विषयमें कुछ लिखना नहीं रहता तथा ज्ञानेश्वरी ग्रंथके विषयमें भी। क्यों कि वह पाठकके हाथमें दिया जा रहा है। ज्ञानेश्वरी मराठीका सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ माना जाता है। इस ग्रंथमें क्या क्या विषय हैं यह इस ग्रंथकी, अलग अलग प्रकारसे की गयी दो विषय-सूचियोंको देखनेसे पता चलेगा। मूलमें विषय सूची नहीं है। हिंदी अनुवाद छपते छपते यह नयी कल्पना सूझी और विषय सूची बनाई गयी। यह जो प्रयास हुवा है वह परंपरा- गत नहीं, हिंदी अनुवादमेंही पहली बार हुवा है। साथ साथ जो कुछ हुवा वह भी शीघ्रता या उता- वलेपनमें हुवा है। परिणामस्वरूप कुछ अटपटा भी लग सकता है। किंतु गहरे अध्येताओंके लिये जो अलग विषय विवेचन है वह अधिक चुस्त है। वह आचार्य श्री शं. वा. दांडेकरजीका बनाया हुवा है। उसमें कुछ परिवर्तन कर दिया गया है। सामान्य वाचकके लिये पहली विषय सूची सहायक होगी तो गहरे अध्ययनके लिये दूसरा विषय विवेचन मार्ग-दर्शक होगा । ११ अनुवादकके विषयमें कुछ- ज्ञानेश्वरी रामकथा या कृष्णकथा नहीं किंतु वेदांत-काव्य है। विषयकी गहनताके साथ मूलकी भाषा अत्यंत प्राचीन है। आज इस भाषाका रूप प्रचलित नहीं है। महाराष्ट्रका सामान्य सुशिक्षित नागरिक भी मूल ज्ञानेश्वरीको भली भांति नहीं समझ पाता। विद्वानोंके लिये भी वह भारी पडता है। ऐसी स्थितिमें एक कन्नड भाषाभाषी द्वारा प्राचीन मराठी वेदांत ग्रंथका हिंदी भाषामें किया गया अनुवाद, वह भी समवृत्तमें, एक प्रकारसे “अव्यापारेषु व्यापार” है। उछलते कूदते, भूतके बंगलेमें घुसनेके बाद, विच्छू कटे बंदरकी शराबके नशेमें की हुई मर्कट चेष्टा-सी ! किंतु केवल प्रेममें ऐसी मूर्खता करनेका साहस होता है। हिंदी भारतकी राष्ट्र-भाषा है। राष्ट्रके साथ जो प्रेम है, आदर या भक्ति है, वही राष्ट्र भाषासे होना स्वाभाविक है। हिंदीको राष्ट्र भाषा मान कर इ. स. १९३५ में हिंदी सीखने के लिये काशी गया। वहांसे लौट कर हिंदी प्रचारका कुछ काम किया। गांधीजीकी वानरसेनाका सैनिक बनकर जो कुछ हम लोगोंने उछल कूद की, इससे, या अन्य कारणोंसे, विदेशी शासनके स्थान पर स्वदेशी शासन आया। स्थिति बदली। स्वदेशी शासनमें जन-समान्यकी हिंदी भाषा वैधानिकरूपसे राज-भाषा बनकर भी केवल वैधानिक भाषा ही रही। हमारा दृष्टिकोण वैज्ञानिक और विशाल होता गया। उस विशालतामें भारत है या नहीं अथवा कहां है यह ढूँढनेपर भी पता नहीं चलता। ऐसी स्थितिमें भारतकी आनेवाली पीढी, लोक-भाषा हिंदीके ज्ञानेश्वरी २७ -