भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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करीब तीस हजार बिक गयी हैं। वैसे ही अन्य कुछ ज्ञानेश्वरी प्रतियां जो इसी एकनाथ महाराजकी संशोधित आवृत्तियां हैं हजारोंकी संख्यामे बिक रही हैं यद्यपि सरकारी ज्ञानेश्वरीसे उसकी कीमत दूनी तो है ही श्रीएकनाथ महाराज स्वयं विद्वान होनेके साथ महान संत भी थे। इसके अतिरिक्त श्रीएकनाथ महाराजने अपने श्रीगुरु जनार्दनस्वामीसे भी ज्ञानेश्वरी सुनी थी । तथा श्रीएकनाथ महाराजके बाद संत तुकाराम और समर्थ रामदासने भी वही ज्ञानेश्वरी पढी और उससे स्फूर्ति ली। आधुनिक युगमें भी श्री साखरे बुवा, श्री. विष्णुबुवा जोग, श्री. बंकट स्वामी, तथा सरकारी ज्ञानेश्वरी संशोधन मंडलके अध्यक्ष श्री दांडेकर जैसे विद्वान भी श्री. एकनाथ द्वारा संशोधित आवृत्ति पढते रहे, महाराष्ट्रके ज्ञानेश्वरभक्त, जो लाखों हैं श्रद्धा भक्तिसे उसीका नित्यपाठ करते हैं। एकनाथ कालसे आज तक, साढेचार सौ वर्षसे अधिक काल तक महाराष्ट्रके लाखों सहृदय भक्तजनोंने उसीका पाठ किया, उसीको कंठ किया, उससे स्फूर्ति ली, उससे प्रेरणा ली, उसीको अपने जीवनका आधार बनाया, उसी ज्ञानेश्वरीको माउली मानकर उपासना की, उससे तुष्ट और पुष्ट हुए, उसको मैं महाराष्ट्रका प्राति- निधिक ग्रंथ मानूं या चार (गेलेलियो) विद्वानोंके मान्य ग्रंथको ? जिनके पीछे कोई परंपरा नहीं, साधना नहीं, उपासना नहीं, यदि कुछ है तो आग्रह, तीखा, कर्कश, असंगत और विसंगत तर्क, अभिनिवेश, और एक प्रकारसे अनुभूतिशून्य शाब्दिक कसरत ! श्री. राजवाडे प्रति ही सच्ची ज्ञानेश्वरी है कहनेवाले विद्वानकी और एक बातने मुझे और अधिक अंतर्मुख किया; “जो कोई आता है सांप्रदायिक ज्ञानेश्वरी देखता है, इस नयी सच्ची ज्ञानेश्वरीका विचार ही नहीं करता !” इसी समय उन विद्वान महाशयने कहा था “फ्रांससे डॉ. द. लेरे आये हैं ! उन्होने सांप्रदायिक ज्ञानेश्वरी ली !” मैं सोचने लगा डॉ. द. लेरे साहबने “सांप्रदायिक” ज्ञानेश्वरी क्यों ली होगी ? इसीके उत्तरमें मुझे ऊपरके विचार सूझे । और ! “सांप्रदायिक” है क्या ? आजकल, कुछ शब्द अर्थ-शून्य-से हो गये हैं । “सांप्र- दायिक” यह शब्द एक गाली-सी बन गया है। ज्ञानेश्वरी जैसे महान ग्रंथके विषयमें भी सांप्रदायिक ग्रंथ और अ-सांप्रदायिक ग्रंथ । उसके अर्थके विषयमें भी सांप्रदायिक-अर्थ और अ-सांप्रदायिक अर्थ ! धर्म, राजनीति, तत्वज्ञान, भाषा, साहित्य आदि विषयमें भी “मैं प्राचीन कुछ नहीं मानता” कहने- वाला तथाकथित, प्रगति-प्रिय बुद्धिजीवियोंका एक “अ-सांप्रदायिक संप्रदाय” बन गया है जो सदैव पूर्वपरंपरासे कटकर अपने आपको अधांतरमें लटकनेवाले जड कटे वृक्षकी भांति लटकता हुवा किसी अज्ञात दिशामें प्रगति कर रहा है। यदि किसी प्रतिभा-संपन्न बुद्धिमान व्यक्तिके लिये किसी बातका नया अर्थ करना हो, समाजको नयी दृष्टि देनी हो, समाजको नया विचार और आचार देना हो, तो उसको अपनी पूर्व-परंपराका पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है। किसी भी तत्वज्ञान विषयक ग्रंथकी, उसके किसी विषयकी, “नयी व्याख्या” करनेसे प्रथम उसके पूर्वाचार्योने उस विषयक शब्दोंसे क्या क्या संकेत लिये हैं इसकी पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है। साथ साथ लेखकने कहां कहां किस अर्थमें किस शब्दका प्रयोग किया है यह भी जानना आवश्यक है। बिना इसके, केवल कोश और व्याकरण देख कर किया गया नया ! अर्थ अनर्थ कर सकता है। अर्थात जब तक किसीको किसी शब्द तथा उसके विचारकी पूर्व परंपराका यह पूर्ण ज्ञान नहीं है उसका किया हुवा नया- अर्थ अथवा दी हुयी नयी दृष्टि “अज्ञान वितरण समारोह ही” है, इसलिये निष्ठा पूर्वक अपनी पूर्व परंपराका पालन करना जन सामान्यका युग-धर्म है। असामान्य गेलेलियोंकी बात दूसरी है ! उनको कभी कहीं देखनेकी आवश्कता नहीं है। जो कुछ उनके प्रथम हो चुका है वह सब सांप्रदायिक है। असांप्रदायिका सब कुछ अपनेसे ही प्रारंभ होता है जैसे अंधेके लिये विश्वमें वह अकेलाही है ! ! अनुवादक इस श्रेणीका प्रतिभा संपन्न व्यक्ति हैही नहीं अथवा उसे अपने आपको अधांतरमें लटकनेवाले जड कटे वृक्षकी भांति बना लेनेका धैर्य है। वह प्रगति करना चाहता है १९ ज्ञानेश्वरी

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