ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अध्याय ४: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
ज्ञान है जो थिर वांछित । मिले वह उसे निश्चित । जिसमें होती अचुंबित । शांति-सुख ॥ ८९ ॥ हृदयमें जब ज्ञान होता । तब शांति-अंकुर फूटता । उससे विस्तार प्रकटता । आत्मबोधका ॥ ९० ॥ फिर जहां देखे वहां । सर्वत्र ही जहां तहां । न दीखे तीर है कहां । शांति सिंधुका ॥ ९१ ॥ ऐसा यह उत्तरोत्तर । ज्ञान बीजका है विस्तार । कहा है उसको अपार । धनंजय ॥ ९२ ॥ अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥ संदेह विनाशका घर है— जिन प्राणियोंमें ज्ञानकी । चाह नहीं वह पानेकी । क्या कहें ऐसे जीवनकी । उससे भली मौत ॥ ९३ ॥ शून्य है जैसे गृह । या प्राण बिनु देह । है जीवित सम्मोह । ज्ञानके बिन ॥ ९४ ॥ हुआ नहीं प्राप्त वह ज्ञान । चाह करता पानेका मन । तब है आशा यह तू जान । पानेकी वह ॥ ९५ ॥ किंतु बात है कैसे ज्ञानकी । आस्था नहीं मनमें उसकी । तो पड़ा है संदेह रूपकी । अग्निमें वह ॥ ९६ ॥ जब अमृत भी नहीं भाता । ऐसा आस्वाद-स्वभाव होता । तभी जानना मरण आता । निकट सत्वर ॥ ९७ ॥ विषय सुखमें जो है रंगता । ज्ञानसे नित विमुख रहता । निश्चय ही संशयमें पड़ता । जानना वह ॥ ९८ ॥ न है ज्ञान न है श्रद्धा संशयीका विनाश है । दोनों ही लोकमें पार्थ न पाता सुख संशयी ॥ ४० ॥ ज्ञानेश्वरी १२८
डूबा यदि संशय सागरमें । नष्ट हुआ निश्चित जीवनमें । वंचित हुआ इह औ' परमें । सुखसे वह ॥ ९९ ॥ किसीको जब कालज्वर आता । वह जैसे शीतोष्ण न जानता । जैसे वह चांदनी औ' उष्णता । मानता एक-सा ॥ २०० ॥ वैसे वह जो सत औ' असत । अनुकूल औ' प्रतिकूल बात । नहीं जानता हित औ' अहित । संशयग्रस्त जो ॥ १ ॥ यह है दिवस औ' यह रात । जन्मांध न जानता यह बात । वैसे ही होता है संशयग्रस्त । मनमें सदा ॥ २ ॥ तभी संशयसे भयंकर । अन्य नहीं पाप कोई घोर । वह है विनाशका भंवर । प्राणियोंका ॥ ३ ॥ इस कारणसे तुझे तजना । पहले इस बातको जानना । ज्ञानाभावमें इसका रहना । जान निश्चित ॥ ४ ॥ पड़ता अज्ञानका गहरा अंधार । बढ़ता यह चितमें अपरंपार । जिससे है पथावरोध धनुर्धर । श्रद्धाका सदा ॥ ५ ॥ योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥ ४१ ॥ ज्ञान खड्ग— हियमें ही यह नहीं समाता । बुद्धि पर भी पर्दा डालता । जिससे संशयात्मक हो जाता । भुवन-त्रय ॥ ६ ॥ इतना है इसका बडप्पन । उसे जीवनका एक साधन । यदि करमें होता है महान । ज्ञान खड्ग ॥ ७ ॥ उस तीखे ज्ञान खड्गसे । मिटता यह मूल रूपसे । मल होता मनका जिससे । सदा निर्मूल ॥ ८ ॥ योगसे छांटके कर्म ज्ञानसे छिन्न संशय । जो सावधान आत्मामें उसे कर्म न बांधते ॥ ४१ ॥ (17) १२९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः । छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥ इस कारणसे तू पार्थ । नष्ट करके हृदयस्थ । संशय अब सर्वथा । ऊठ सत्वर ॥ ९ ॥ ऐसा सर्वज्ञोंका बाप । श्रीकृष्ण जो ज्ञानदीप । कहता वह सकृप । सुनो राजन् ॥ २१० ॥ कथा यह पूर्वापर । अर्जुन विचारकर । पूछेगा प्रश्न सत्वर । समयोचित ॥ ११ ॥ उस कथाकी संगति । भावकी है संपत्ति । उसकी है उन्नति । कहेगा हरि ॥ १२ ॥ उसकी उत्तमता पर । आठो रस हैं न्योच्छावर । वह है सज्जनोंका घर । आसरेका ॥ १३ ॥ प्रकट करेगा शांति-रस निर्मल । है वह महासागरसे भी खोल । मेरी देश-भाषाका अनमोल बोल । अर्थपूर्ण ॥ १४ ॥ बिंब दीखता है हथेली समान । प्रकाशमें ओछा होता त्रिभुवन । अनुभवना ऐसी व्याप्ति महान । शब्दार्थकी ॥ १५ ॥ अजी ! कामितार्थकी जो आशा । फलती कल्पवृक्षमें जैसा । बोल हैं अति व्यापक ऐसा । सुननाजी ॥ १६ ॥ रहने दो अब है क्या कहना । सर्वज्ञ जानते मनो कामना । फिर भी करता नम्र प्रार्थना । सुनना चित्त देके ॥ १७ ॥ यहां साहित्य तथा शांति । वैसे रेखा शब्द पद्धति । जैसे लावण्य गुण कुलवति । तथा पतिव्रता ॥ १८ ॥ पहले ही प्रिय है शक्कर । मिलती पथ्यके नाम पर । खाना या न ग्वाना बात फिर । रहती कहां ? ॥ १९ ॥ तभी हृदयका सारा अज्ञान-कृत संशय । ज्ञानके खड्गसे तोड ऊठ तू योग साधके ॥ ४२ ॥ ज्ञानेश्वरी १३०
मळयानिलय मंद सुगंध । उसमें मिला अमृतका स्वाद । उसके साथ हो सुस्वर नाद । दैव-गतिसे ॥ २२० ॥ स्पर्शसे सर्वांग शांत करता । माधुरीसे रसनाको नचाता । श्रवणेंद्रियसे है कहलाता । भला भला ॥ २१ ॥ वैसे है इस कथाका सुनना । कानोंका है प्रसन्न होना । संसार-दुःखका मूलसा होना । उच्चाटन ही ॥ २२ ॥ मंत्रसे यदि शत्रु मरता । कौन तलवार बांधता । दूध मधुसे रोग जाता । कौन पीवे नीम ॥ २३ ॥ वैसे मनको न मारते । इंद्रियोंको न सताते । अनायास ही मोक्ष पाते । श्रवण-मात्रसे ॥ २४ ॥ सुन सब हो प्रसन्न मन । करके गीतार्थका चिंतन । ज्ञानदेवका यह वचन । जो है निवृत्तिका दास ॥ २२५ ॥ गीता श्लोक ४२ ज्ञानेश्वरी ओवी २२५
५ कर्म-संन्यासयोग अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥ पार्थका प्रश्न, कर्म-संन्यास या कर्म-योग— पार्थ कहता फिर श्रीकृष्णसे । आपका बोलना यह भी कैसे । एक हो तो अंतःकरणसे । सोचे उसको ॥ १ ॥ पहले कहा संन्यास कर्मका । तूने किया था निरूपण् उसका । अब कहता अतिशय कर्मका । कैसे अनंत ॥ २ ॥ कैसी यह दो अर्थकी बात । हमारा अज्ञानियोंका चित्त । अपने आप कहे अनंत । समझेगा कैसे ॥ ३ ॥ सार तत्वको कहना । एक निष्ठासे बोलना । और क्या कहूं कहना । तुझसे अब ॥ ४ ॥ तभी कहा मैंने तुझसे । प्रभुजनोंसे विनयसे । परमार्थको द्वि-अर्थसे । कहना नहीं ॥ ५ ॥ अर्जुनने कहा कहता कर्म-संन्यास वैसे ही योग भी कभी । दोनोंमें जो भला एक कह तू मुझ निश्चित ॥ १ ॥
हुआ जो वह जाने देना । अबकी यह सुलझा देना । इन दोनोंमें अब बताना । मार्ग उत्तम ॥ ६ ॥ अन्त है जिसका मंगल । निश्चित है जिसका फल । अनुष्ठानमें जो सकल । शुद्ध सहज ॥ ७ ॥ जिसमें न होता नींदका भंग । किंतु कटता प्रवास मारग । ऐसा सुखासनसा सुभग । तथा सरल ॥ ८ ॥ अर्जुनके इस वचनसे । रीझे हरि अंतःकरणसे । फिर कहा अति संतोषसे । ऐसा ही होगा ॥ ९ ॥ माय जो कामधेनुसी । रहती साथ छायासी । मांगनेसे चंदा भी जैसी । देती खेलने ॥ १० ॥ शंभुने प्रसन्न चित्त । उपमन्युको जो आर्त । दिया जैसा दूध भात । क्षीराब्धी ही ॥ ११ ॥ वैसा सागर जो औदार्यका । सखा बना आप अर्जुनका । क्यों न हो तब सर्व सुखका । वसति-स्थान वह ॥ १२ ॥ इसमें क्या है कौतुक । लक्ष्मीकांत है मालिक । तो क्यों न मांगे ऐच्छिक । वरदान ॥ १३ ॥ मांगा था जो अर्जुनने । “दिया” कहा श्रीकृष्णने । कहा क्या तब हरिने । वही कहूंगा ॥ १४ ॥ भगवान उवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयस्करावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥ कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर— हरि कहे सुन कुंती-सुत । विचार करने पर चित्त । संन्यास योग दोनों तत्वतः । हैं मोक्ष-दायक ॥ १५ ॥ श्रीभगवानने कहा कर्म-संन्यास औ' योग एक-से मोक्ष-दायक । किंतु संन्याससे माना कर्म-योग विशेष है ॥ २ ॥ १३३ कर्म-संन्यासयोग
किंतु जान अनजानको सकल । आचरणमें कर्मयोग सरल। जैसे स्त्री बालक भी नांवके बल । तैरते सागर ॥ १६ ॥ सरासरी विचारनेसे । मार्ग यह सरल ऐसे । संन्यास फल मिले इससे । अनायास ॥ १७ ॥ करूंगा अब कथन । संन्यासका जो लक्षण । सहज हैं ये अभिन्न । जानेगा तू ॥ १८ ॥ ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ नैष्कर्म्यका अर्थ आलस्य नहीं— गतको जो भुलाना । प्राप्तव्यको तजना । मेरु-सा स्थिर होना । अंतरमें ॥ १९ ॥ मैं मेरा ऐसा सब स्मरण । भूला जिसका अंतःकरण । उसीको तू संन्यासी जान । निरंतर ॥ २० ॥ मनसे जो ऐसा हुवा । संगसे सदा मुक्त हुआ । जिसको है प्राप्त हुआ । शाश्वत सुख ॥ २१ ॥ गृह आदिका तब पूर्ण । तजनेका नहीं कारण । आसक्त स्वभावका मन । हुआ असंग ॥ २२ ॥ आग जब बुझ जाती । केवल राख रहती । कपास भी लपेटती । वैसे ही ॥ २३ ॥ रहकर भी उपाधिमें । न पड़ता कर्म-बंधमें । न रहा जिसकी बुद्धिमें । संकल्प बीज ॥ २४ ॥ कल्पनाका साथ जब टूटता । तभी संन्यास सहज बनता । इससे दोनों एक हो जाता । कर्म औ' संन्यास ॥ २५ ॥ जानो जो नित्य संन्यासी राग-द्वेष नहीं जिसे । द्वंद्वसे दूर जो होता सुखसे बंध-मुक्त भी ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी १३४
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४ ॥ नहीं तो सुन पार्थ । हैं जो मूर्ख सर्वथा । वे सांख्य कर्म संस्था । जानेंगे कैसे ॥ २६ ॥ स्वभावसे जो अज्ञान । तभी कहते हैं भिन्न । एकेक दीपका भिन्न । प्रकाश होता क्या ? ॥ २७ ॥ करके एकका आचरण । अनुभव किया है संपूर्ण । कहते हैं अनुभव ज्ञान । दोनोंका एक ॥ २८ ॥ यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥ सांख्यसे जो मिलता । योगसे वही प्राप्त होता । तभी है दोनोंमें एकता । सहज भावसे ॥ २९ ॥ देख आकाश औ' अवकाश । जिसमें भेद नहीं है जैसा । योग तथा संन्यास भी ऐसा । है अभिन्न ॥ ३० ॥ जिसने सांख्य योग अभिन्न । देखा है उसको हुवा ज्ञान । उसने आत्मरूप दर्शन । किया सहज ॥ ३१ ॥ संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ ६ ॥ है जो युक्त पंथसे पार्थ । चढते हैं मोक्ष पर्वत । महा सुखका वे निश्चित । पायेंगे शिखर ॥ ३२ ॥ सांख्य औ' योग है भिन्न कहते अज्ञ-लोग जो । दोनोंमें एकसी निष्ठा दोनोंका फल एक है ॥ ४ ॥ पाते हैं स्थान जो सांख्य योगीको मिलता वह । दोनोंका एक ही रूप देखे जो जानता वह ॥ ५ ॥ योगके बिन संन्यास सुखसे मिलता नहीं । मुनि जो योगसे युक्त पाता है शीघ्र ब्रह्मको ॥ ६ ॥ १३५ कर्म-संन्यासयोग
जो यह योग स्थिति है तजता । व्यर्थ ही उलझनमें पड़ता । उससे प्राप्त कभी नहीं होता । संन्यास साध्य ॥ ३३ ॥ योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥ संकल्पशून्य मन चैतन्यमय हो, सर्वव्यापी बनता है— जिसने भ्रांतिसे है छुड़ा लिया । गुरुवाक्यसे मनको धो दिया । आत्म रूपमें फिर ढाल दिया । धुलकर ॥ ३४ ॥ सागरमें जब नून गिरता । तब तक वह अल्प रहता । फिर वह समुद्रसा बनता । विलीन होकर ॥ ३५ ॥ वैसे तो संकल्पसे हुआ भिन्न । चैतन्य रूप हुआ उसका मन । सीमित होकर भी तनसे मन । व्यापता लोकत्रय ॥ ३६ ॥ कर्ता कर्म फिर काज । कटा जिसका सहज । अनुभवता वह सहज । अकर्तापन ॥ ३७ ॥ नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित् । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८ ॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥ जिसका मन अर्जुन । मैं देह हूं यह भान । भूला उसे न रहा जान । कर्तापन कछु ॥ ३८ ॥ चित्तसे शुद्ध जो योगी जीतके मन इंद्रिय । बना है जीव भूतोंका करके भी अलेप जो ॥ ७ ॥ मानके अकर्ता आप योगी तत्वज्ञ जो नित । देखें सुने छुये सूंघे खाये सुवे चले करे ॥ ८ ॥ बोले छोडे पकडे या हिलावे बरुनी यदि । इंद्रिया करतीं आप अपना कर्म जानता ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी १३६
तन त्यागके बिन । अमूर्तके जो गुण । दीखते हैं संपूर्ण । योग-युक्तमें ॥ ३९ ॥ वैसे उसका भी होता शरीर । अन्योंकी भाँति करता व्यापार । एक जैसा सबका व्यवहार । उसका भी ॥ ४० ॥ वह भी आंखोंसे देखता । वैसे ही कानसे सुनता । किंतु वह लिप्त न होता । उसमें कभी ॥ ४१ ॥ यदि वह सबको स्पर्शता । घ्राणसे परिमल भी लेता । समयोचित वह बोलता । सबके भाँति ॥ ४२ ॥ आहारको स्वीकारता । तजना जो तजता । निद्रा समयमें सोता । सुखसे वह ॥ ४३ ॥ अपनी ही इच्छासे । वह चलता जैसे । सकल कर्म वैसे । चलते हैं ॥ ४४ ॥ यह कहना क्या एकेक । देखें श्वासोच्छ्वासादिक । वैसे ही निमिषोन्निमिष । आदि सब ॥ ४५ ॥ पार्थ वह सब करता । कोई कर्म नहीं छोड़ता । किया ऐसा बोध न होता । प्रतीतिसे ॥ ४६ ॥ भ्रांतिकी सेज पर जो सोया था । स्वप्न रंजनमें जो उलझा था । ज्ञानोदयसे वह 'है, जगा था । इसीलिये ॥ ४७ ॥ ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवांभसा ॥ १० ॥ चैतन्यके आश्रयसे अब । इंद्रियोंकी वृत्तियां सब । बरतती हैं अपने तब । स्वभावसे ॥ ४८ ॥ जैसे दीपकके प्रकाशसे । व्यापार होते घरके जैसे । चलते शरीर कर्म वैसे । योगयुक्तके ॥ ४९ ॥ ब्रह्मार्पित करे कर्म करता संग छोड़के । न होता पापसे लिप्त जलमें पद्म-पत्रसा ॥ १० ॥ (18) १३७ कर्म-संन्यासयोग
सभी कर्म है वह करता । कर्म बंधनमें नहीं आता । जैसे पानीमें नहीं भीगता । पद्मपत्र ॥ ५० ॥ कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिंद्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वंति संगं त्यक्त्वाऽत्मशुद्धये ॥ ११ ॥ कर्मकी विविधता-विवेचन— जो बुद्धिकी भाषा नहीं जानता । मनमें अंकुर नहीं फूटता । ऐसा व्यापार जो तनसे होता । वह शरीर कर्म ॥ ५१ ॥ इसीको स्पष्ट रूपसे कहता । जैसा बालकका कर्म है होता । योगीका कर्म वैसे ही रहता । केवल तनसे ॥ ५२ ॥ जब पंच भौतिक तन । रहता है निद्रामें लीन । कार्य करता तब मन । स्वप्न रूपमें ॥ ५३ ॥ आश्चर्य देख तू धनुर्धर । कितना है वासना विस्तार । देहको नहीं होता जागर । भोगता सुख दुःख ॥ ५४ ॥ इंद्रियोंका स्पर्श भी न करता । ऐसा व्यापार जो होता रहता । यह केवल कर्म कहलाता । मनका ही ॥ ५५ ॥ वह कर्म भी योगी करता । किंतु उससे बद्ध न होता । उसका साथ छूटा रहता । अहंकारसे ॥ ५६ ॥ जैसे होता है भ्रम हत । पिशाच स्पर्शसे जो चित्त । करता इंद्रियां चेष्टित । विकल रूपसे ॥ ५७ ॥ रूप भी है वह देखता । कानसे भी वह सुनता । शब्द भी है वह बोलता । पर बेभान हो ॥ ५८ ॥ यह जो है बिन प्रयोजन । जो कुछ वह करता जान । वह केवल कर्म है मान । इंद्रियोंका ॥ ५९ ॥ केवल इंद्रियोंसे या शरीर मन बुद्धिसे । आत्म-शुद्ध्यर्थ ही योगी करे कर्म असंग हो ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी ११८
सर्वत्र फिर जाननेका । कार्य रहता जो बुद्धिका । यह कथन है हरिका । अर्जुनसे ॥ ६० ॥ बुद्धिको आधार मानकर । कर्म करते चित्त देकर । किंतु वे नैष्कर्म्यसे पर । मुक्त दीखते ॥ ६१ ॥ बुध्दिसे तन तक कहीं । अहंकारका चिन्ह भी नहीं । ये कर्म करके ही वही । शुद्ध रहते ॥ ६२ ॥ कर्तृत्वभाव बिन कर्म । होता वही सही निष्कर्म । जानते ये उसका मर्म । गुरु-गम्य जो ॥ ६३ ॥ नैष्कर्म्य भावका दर्शन— शांति-रसका अब पूर । छलके पात्रके ऊपर । बोल जो वाणीसे भी पर । होते हैं व्यक्त ॥ ६४ ॥ पराधीनता इंद्रियोंकी । मिटी है संपूर्ण जिनकी । सुननेमें योग्यता उनकी । मानना यहां ॥ ६५ ॥ रहने दो अति प्रसंग । न छोड़ो जी कथाका संग । होगा श्लोक संगति भंग । इसीलिये ॥ ६६ ॥ अनाकलन जो मनसे । प्रज्ञा-घर्षण करनेसे । वही मुझे दैव कृपासे । हुआ सहज ॥ ६७ ॥ स्वभावसे जो शब्दातीत । आया शब्दके अंतर्गत । औरोंकी रही क्या है बात । क्या कहो ॥ ६८ ॥ आग्रह विशेष श्रोताओंका । जानकर दास निवृत्तिका । कहता है संवाद दोनोंका । सुनो ध्यानसे ॥ ६९ ॥ कहता है कृष्ण अर्जुनसे । प्राप्तोंका लक्षण होता कैसे । कहता तुम्हें पूर्ण रूपसे । सुनो चित्त देकर ॥ ७० ॥ युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोति नैष्ठिकम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥ फलको तजके योगी पाता है शांति निश्चल । अ-योगी फलका भोगी वासनामें फंसा रहा ॥ १२ ॥ १९९ कर्म-संन्यासयोग
संपन्न होता जो आत्म योगसे । उदासीन कर्म फल भोगसे । रमती शांति सदैव उससे । अपने आप ॥ ७१ ॥ अर्जुन जो कर्म बंधसे । अभिलाषाकी ही डोरीसे । बांधा जाता है खूंटेसे । फल भोगके ॥ ७२ ॥ सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥ करता जैसे फलकामनासे । सभी कर्म वह करता वैसे । करता है फिर पूर्ण रूपसे । उपेक्षा उसकी ॥ ७३ ॥ जिस ओर उसकी दृष्टि । होती वहां सुखकी सृष्टि । जहां वह कहता वृष्टि । होती महा-बोधकी ॥ ७४ ॥ नवद्वारके देहमें जैसे । रहकर न रहता वैसे । करके सब न करे वैसे । रहे फलत्यागी ॥ ७५ ॥ न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥ निष्काम कर्मयोगीकी महानता-- होता है जैसे सर्वेश्वर । जब चाहे तब निर्व्यापार । करता वही सब विस्तार । त्रिभुवनका ॥ ७६ ॥ कहें यदि उसको कर्ता । कर्ममें वह न डूबता । हाथ पैर लिप्त न होता । उदास वृत्तिसे ॥ ७७ ॥ योग-निद्राका भंग न होता । अ-कर्तापन नहीं मलता । दलभार जो खड़ा करता । महाभूतोंका ॥ ७८ ॥ मनसे छोड़के कर्म सुखसे संयमी सभी । नौ द्वार पुरमें देही कराता करता नहीं ॥ १३ ॥ नहीं कर्तृत्व लोगोंका न कर्म सृजता प्रभु । न कर्म-फल संयोग होता सब स्वभावसे ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी १४०
सबके जीवनमें जो बसता । किंतु किसीका कोई न होता । विश्व बनता औ' उजाड़ता । उसका कुछ नहीं ॥ ७९ ॥ नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनाऽवृतंज्ञानं तेन मुह्यंति जन्तवः ॥ १५ ॥ अशेष पाप पुण्य उसके । समीप रहते हैं विश्वके । किंतु साक्षी न होता उसके । अन्य बात क्या ॥ ८० ॥ वह रहता मूर्तिके साथ । मूर्ति रूप होकर सतत । किंतु न मलता रूप अमूर्त्त । उस पुरुषका ॥ ८१ ॥ पालता वह सृजता संहारता । चराचर सब है यही बोलता ! सुन तू यह अज्ञान ही है पार्थ । सबका यहां ॥ ८२ ॥ ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥ अज्ञान यह समूल टूटता । भ्रांतिका तम भी है दूर होता । फिर अकर्तृत्व प्रकट होता । ईश्वरका ॥ ८३ ॥ ईश्वर है यहां एक अकर्ता । तब चित्त यदि ऐसा मानता । तब वही मैं यह स्वभावता । आदिसे हूँ ॥ ८४ ॥ होता जब ऐसा विवेक चित्तमें । उसको भेद कैसा त्रिभुवनमें । देखता अपने ही अनुभवमें । विश्व है मुक्त ॥ ८५ ॥ सूर्योदय होता पूर्व दिशामें । प्रकाश होता दश दिशामें । उस समय किसी दिशामें । तम न रहता ॥ ८६ ॥ किसीका भी न लें पाप वैसे ही पुण्य भी प्रभु । अज्ञानसे ढका ज्ञान इससे जीव मोहित ॥ १५ ॥ हुवा अज्ञानका नाश जिनका आत्म ज्ञानसे । स्वच्छ दीखे पर-ब्रह्म मानो सूर्य-प्रकाश है ॥ १६ ॥ १४१ कर्म-संन्यास योग
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७ ॥ बुद्धिनिश्चयसे हो आत्मज्ञान । अपनेको ब्रह्म स्वरूप मान । ब्रह्मनिष्ठासे है तत्परायण । रहता दिनरात ॥ ८७ ॥ ऐसा भला व्यापक ज्ञान । जिनके हियमें पायास्थान । उनकी सम-दृष्टिका वर्णन । विशेष कैसे ॥ ८८ ॥ देखते अपने को जैसे । विश्वको देखते हैं वैसे । सहज कहनेमें इसे । आपत्ति क्या ॥ ८९ ॥ दैव जैसे लीलासे । न देखें दैन्य जैसे । न जाने विवेक जैसे । भ्रांतिको ॥ ९० ॥ अथवा अंधःकारका प्रकार । न देखता स्वप्नमें भी भास्कर । न आती अमृतके कान पर । मृत्युवार्ता ॥ ९१ ॥ जाने दो संताप है कैसा । न जानता चंद्र वैसा । ज्ञानी भी प्राणियोंमें वैसा । न जाता भेद ॥ ९२ ॥ विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥ यह है झींगुर यह गज । या यह चांडाल यह द्विज । या वह अन्य यह आत्मज । यह रहे कैसे ॥ ९३ ॥ या वह धेनु औ' यह श्वान । एक महान औ' दूजा हीन । इसका स्वप्नमें भी न भान । जगनेमें कैसे ॥ ९४ ॥ जहां है अहंकार भाव । वहीं है द्वेतका संभव । जहां अहंका ही अभाव । वहां विषमता कैसी ॥ ९५ ॥ बुद्धि निश्चय निष्ठाको उसीमें कर अर्पित । नहीं लेते पुनः जन्म ज्ञानसे पाप धो कर ॥ १७ ॥ विद्या विनय संपन्न द्विज गाय तथा गज । श्वान चांडाल जो सारे तत्वज्ञ सम देखते ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी १४२
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥ इसीलिये सर्वत्र सदा सम । आप ही है जो आद्य ब्रह्म । जानकर यह संपूर्ण मर्म । समदृष्टिका ॥ ९६ ॥ विषय संग नहीं छोड़ते । इंद्रिय डंडन न करते । असंगता है ये भोगते । निरिच्छामे ॥ ९७ ॥ सब लोगोंके ही अनुसार । करता है लौकिक व्यापार । किंतु अज्ञानको छोड़कर । लौकिकका ॥ ९८ ॥ जन-जनमें जैसा खेचर । होकर भी न होता गोचर । वैसे देहधारीको संसार । नहीं जानता ॥ ९९ ॥ जैसे पवन-गतिके साथ । जल पे खेले जल सतत । जानते जन उसमें द्वैत । तरंग रूप ॥ १०० ॥ वैसे नाम-रूप भिन्नताका । वैसे ब्रह्म ही सच है एक । मन साम्य हुआ है जिसका । सदा सर्वत्र ॥ १ ॥ ऐसी जिसकी समदृष्टि है । उस नरके जो लक्षण हैं । संक्षेपमें हरि कहता है । अर्जुनसे ॥ २ ॥ न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥ जैसे मृगजलका महापूर । हिला नहीं सकता गिरिवर । वैसे शुभ अशुभमें विकार । उठते नहीं ॥ ३ ॥ वही है निश्चित । समदृष्टि प्राप्त । हरि कहे पार्थ । वही ब्रह्म ॥ ४ ॥ यहीं जीत लिया जन्म स्थिर हो सम-बुद्धिमें । निर्दोष सम जो ब्रह्म उसीमें जो हुए स्थिर ॥ १९ ॥ न होता प्रियसे हर्ष अप्रियसे न व्याकुल । बुद्धि निश्चल निर्मोह ब्रह्मज्ञ ब्रह्ममें स्थिर ॥ २० ॥ १४३ कर्म-संन्यासयोग
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विंदत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥ निज वृत्तिको छोड़कर । न आता इंद्रियग्राम पर । विषय सेवन वहां पर । विचित्र ही है ॥ ५ ॥ अपार सहज-स्व-सुखमें । स्थित होनेसे अपने ही में । न झांकता कभी बाहरमें । पांडुकुमार ॥ ६ ॥ थाली है जिसकी कुमुददल । भोजन चंद्रकिरण शीतल । औ' वह चकोर खायेगा धूल । यह संभव है क्या ॥ ७ ॥ मिला जिसे निज सहज सुख । अपनेमें स्थित अंतर-सुख । उसका छूटेगा विषय सुख । अपने आप ॥ ८ ॥ वैसे भी स-कौतुक । विचार करके देख । यह जो विषय सुख । चाहता कौन ॥ ९ ॥ ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यंतवंतः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥ जिसने अन्तर्सुख नहीं देखा वही विषय सुखके पीछे पड़ते हैं— देखा नहीं जिसने निज सुख । रमता वही इंद्रियार्थी देख । बासी रोटी देख कर भी रंक । जैसे चाहता उसे ॥ १० ॥ अथवा मृग जो तृषा पीडित । भ्रमसे छोड़कर जल सोत । दौड़ते रहते मृग-जलार्थ । ऊसरमें सदा ॥ ११ ॥ जिसे नहीं निज सुखका अनुभव । औ' जिसको स्वरूपानंदका अभाव । उसको है विषय सुखका वैभव । भाते अपार ॥ १२ ॥ असंग विषयोंमें जो जानके आत्मका सुख । लीन होके ब्रह्ममें ही पाता है सुख अक्षय ॥ २१ ॥ इंद्रियोंके सभी भोग दुःख कारण केवल । उठते गिरते जान ज्ञानी न रमता वहां ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी १४४
विषयोंमें वैसा कुछ सुख है । कहने जैसा भी कुछ नहीं है । विद्युल्लतासे जैसे न होता है । प्रकाश जगतमें ॥ १३ ॥ बात वर्षा आतपमें यदि साया । करती है घने बादलकी काया । व्यर्थ है तब बांधना धनंजय । महलादिक ॥ १४ ॥ विषयोंको सुख कहना । व्यर्थकी बात है कहना । विषकंदको ही कहना । जैसा अति-मधुर ॥ १५ ॥ कहते जैसे भूमिपुत्रको मंगल । अथवा मृगजलको कहते जल । विषयानुभव कहलाता गरल । वैसे ही व्यर्थ ॥ १६ ॥ जाने वे पार्थ सब ये बोल । सर्प फनकी साया शीतल । होगी कह कहाँ तक निश्चल । मूशकको ॥ १७॥ आमिष ग्रास जैसा अर्जुन । न खाये तब तक भला मीन । वैसा विषय संग संपूर्ण । जान तू निश्चित ॥ १८ ॥ विरक्तियोंकी जो दृष्टि । देखती इसे किरीटी । पांडुरोगकी है पुष्टि । वैसे ही ॥ १९॥ तभी विषय भोगमें सुख । जानो है वह साद्यंत ही दुःख । किंतु क्या करेंगे जन मूर्ख । भोगके न थकते ॥ १२० ॥ न जानते अंतरंग बेचारे । इसीलिये सब सेवन करे । कहो पूय 'पंकके है जो कीरे । क्या करेंगे घृणा ॥ २१ ॥ दुख ही उन दुखितोंका घर । है विषय कर्दम ही दुर्दर । भोग-जल जलके जलचर । छोड़ें कैसे ॥ २२ ॥ और जो ये दुःख योनी हैं । सब निरर्थक होती हैं । यदि जीव सब विरत हैं । विषयोंमें ॥ २३ ॥ वैसे ही गर्भवासका कष्ट । या जन्म-मरणादि संकट । • अविश्रांत रूप यह बाट । चलेगा कौन ॥ २४ ॥ विषयी यदि विषय छोड़ेंगे । महादोष ये जो कहाँ रहेंगे । संसारादि नाम ये व्यर्थ होंगे । इस जगतके ॥ २५ ॥ तभी किया सुख बुद्धिसे स्वीकार । विषय सुखका है जीवन भर । कर दिखाया मिथ्याको सच कर । अविद्याजात ॥ २६ ॥ १४५ कर्म-संन्यासयोग (19)
सुन अर्जुन इस कारणसे । विष है विषय विचारनेसे । नहीं जा तू कभी इस राहसे । भूल कर भी ॥ २७ ॥ इससे ये विरक्त पुरुष । त्यजते हैं जैसे मान विष । न भाता उन्हे सुख रूप दुःख । विषयोंका कभी ॥ २८ ॥ शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३ ॥ बात नहीं ज्ञानियोंमें । विषयकी सपनेमें । देह भावको देहमें । मिटाया है ॥ २९ ॥ सदा जिसका अंतःकरण । अनुभवता सुख महान । न जाने अन्य कछु अर्जुन । विषयादिक ॥ १३० ॥ वे हैं भोगते द्वैत भावसे । पक्षीके फल चुगने जैसे । यहां संपूर्ण विसर्जनसे । भोक्ता भावके ॥ ३१ ॥ भोगमें ऐसी अवस्था आती । अहंताका परदा हटाती । महासुखालिंगन कराती । ऐक्य भावका ॥ ३२ ॥ उस आलिंगनके समय । जलमें होता जलका लय । मिट जाता है वैसा उभय । न दीखता भेद ॥ ३३ ॥ या आकाशमें खो जाता वात । मिटती वह "दो" ऐसी बात । रहता सुख मात्र शाश्वत । भोगमें वहाँ ॥ ३४ ॥ द्वैतकी भाषा मिटती है जहाँ । रहता है फिर ऐक्य ही वहाँ । रहता फिर साक्षी कौन कहाँ । जानता जो ॥ ३५ ॥ योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥ यलसे मृत्युके पूर्व देहमें जो पचा सका । काम क्रोधादिके वही योगी वही सुखी ॥ २३ ॥ प्रकाश स्थिरता सौख्य मिला अंतरमें जिन्हे । ब्रह्म ही बनके योगी पाता निर्वाण ब्रह्ममें ॥ २४ ॥ ज्ञानेश्वरी १४६
लभंते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५ ॥ इसीलिये जाने दो संपूर्ण । न बोलने जैसा बोले कौन । जानेगा सहज ज्ञानी चिह्न । आत्माराम ॥ ३६ ॥ जो हैं ऐसे सुखमें मगन । अपनेमें हैं आप अर्जुन । वे ढली हुई मूर्ति समान । समरसकी ॥ ३७ ॥ हैं वे आनंदके अनुकोर । महासुखके हैं जो अंकुर । या महाबोधके हैं विहार । बने जो ॥ ३८ ॥ वे हैं विवेकके गांव । परब्रह्मका स्वभाव । या सजे हैं अवयव । ब्रह्मविद्याके ॥ ३९ ॥ वे हैं सत्वके सात्विक । या चैतन्यके आंगिक । क्यों कर ये एक एक । बखानना है ॥ १४० ॥ विषय विस्तारकेलिये श्रीनिवृत्तिका उलाहना— जब तू संत स्तवन रचता । कथाका विचार नहीं करता । विषयांतर कर तू बोलता । सनागर ॥ ४१ ॥ कर तू रसातिरेक संकुचित । ग्रंथार्थ दीप कर-प्रज्वलित । साधु हृदय मंदिर कर प्रभात । मंगलकारक ॥ ४२ ॥ ऐसा गुरुका अव्हाइन । निवृत्तिके दासने सुन । कहता श्रीकृष्ण-वचन । वही सुनो ॥ ४३ ॥ जिसने अनंत सुखका सागर । तलका लिया है सुदृढ आधार । वह तद्रूप होकर वहीं स्थिर । हुए हैं पार्थ ॥ ४४ ॥ विशुद्ध आत्म प्रकाशमें । विश्व देखता अपनेमें । वह है ब्रह्म रूप तनमें । मानना निश्चित ॥ ४५ ॥ पाते हैं ब्रह्म-निर्वाण होते हैं क्षीण-पाप जो । असंशयी ऋषी ज्ञानी जो विश्व हितमें रत ॥ २५ ॥ १४७ कर्म-संन्यासयोग