भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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किंतु जान अनजानको सकल । आचरणमें कर्मयोग सरल। जैसे स्त्री बालक भी नांवके बल । तैरते सागर ॥ १६ ॥ सरासरी विचारनेसे । मार्ग यह सरल ऐसे । संन्यास फल मिले इससे । अनायास ॥ १७ ॥ करूंगा अब कथन । संन्यासका जो लक्षण । सहज हैं ये अभिन्न । जानेगा तू ॥ १८ ॥ ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ नैष्कर्म्यका अर्थ आलस्य नहीं— गतको जो भुलाना । प्राप्तव्यको तजना । मेरु-सा स्थिर होना । अंतरमें ॥ १९ ॥ मैं मेरा ऐसा सब स्मरण । भूला जिसका अंतःकरण । उसीको तू संन्यासी जान । निरंतर ॥ २० ॥ मनसे जो ऐसा हुवा । संगसे सदा मुक्त हुआ । जिसको है प्राप्त हुआ । शाश्वत सुख ॥ २१ ॥ गृह आदिका तब पूर्ण । तजनेका नहीं कारण । आसक्त स्वभावका मन । हुआ असंग ॥ २२ ॥ आग जब बुझ जाती । केवल राख रहती । कपास भी लपेटती । वैसे ही ॥ २३ ॥ रहकर भी उपाधिमें । न पड़ता कर्म-बंधमें । न रहा जिसकी बुद्धिमें । संकल्प बीज ॥ २४ ॥ कल्पनाका साथ जब टूटता । तभी संन्यास सहज बनता । इससे दोनों एक हो जाता । कर्म औ' संन्यास ॥ २५ ॥ जानो जो नित्य संन्यासी राग-द्वेष नहीं जिसे । द्वंद्वसे दूर जो होता सुखसे बंध-मुक्त भी ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी १३४