ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहुआ जो वह जाने देना । अबकी यह सुलझा देना । इन दोनोंमें अब बताना । मार्ग उत्तम ॥ ६ ॥ अन्त है जिसका मंगल । निश्चित है जिसका फल । अनुष्ठानमें जो सकल । शुद्ध सहज ॥ ७ ॥ जिसमें न होता नींदका भंग । किंतु कटता प्रवास मारग । ऐसा सुखासनसा सुभग । तथा सरल ॥ ८ ॥ अर्जुनके इस वचनसे । रीझे हरि अंतःकरणसे । फिर कहा अति संतोषसे । ऐसा ही होगा ॥ ९ ॥ माय जो कामधेनुसी । रहती साथ छायासी । मांगनेसे चंदा भी जैसी । देती खेलने ॥ १० ॥ शंभुने प्रसन्न चित्त । उपमन्युको जो आर्त । दिया जैसा दूध भात । क्षीराब्धी ही ॥ ११ ॥ वैसा सागर जो औदार्यका । सखा बना आप अर्जुनका । क्यों न हो तब सर्व सुखका । वसति-स्थान वह ॥ १२ ॥ इसमें क्या है कौतुक । लक्ष्मीकांत है मालिक । तो क्यों न मांगे ऐच्छिक । वरदान ॥ १३ ॥ मांगा था जो अर्जुनने । “दिया” कहा श्रीकृष्णने । कहा क्या तब हरिने । वही कहूंगा ॥ १४ ॥ भगवान उवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयस्करावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥ कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर— हरि कहे सुन कुंती-सुत । विचार करने पर चित्त । संन्यास योग दोनों तत्वतः । हैं मोक्ष-दायक ॥ १५ ॥ श्रीभगवानने कहा कर्म-संन्यास औ' योग एक-से मोक्ष-दायक । किंतु संन्याससे माना कर्म-योग विशेष है ॥ २ ॥ १३३ कर्म-संन्यासयोग