ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५ कर्म-संन्यासयोग अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥ पार्थका प्रश्न, कर्म-संन्यास या कर्म-योग— पार्थ कहता फिर श्रीकृष्णसे । आपका बोलना यह भी कैसे । एक हो तो अंतःकरणसे । सोचे उसको ॥ १ ॥ पहले कहा संन्यास कर्मका । तूने किया था निरूपण् उसका । अब कहता अतिशय कर्मका । कैसे अनंत ॥ २ ॥ कैसी यह दो अर्थकी बात । हमारा अज्ञानियोंका चित्त । अपने आप कहे अनंत । समझेगा कैसे ॥ ३ ॥ सार तत्वको कहना । एक निष्ठासे बोलना । और क्या कहूं कहना । तुझसे अब ॥ ४ ॥ तभी कहा मैंने तुझसे । प्रभुजनोंसे विनयसे । परमार्थको द्वि-अर्थसे । कहना नहीं ॥ ५ ॥ अर्जुनने कहा कहता कर्म-संन्यास वैसे ही योग भी कभी । दोनोंमें जो भला एक कह तू मुझ निश्चित ॥ १ ॥