ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ
पृष्ठ 199, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 199
मळयानिलय मंद सुगंध । उसमें मिला अमृतका स्वाद । उसके साथ हो सुस्वर नाद । दैव-गतिसे ॥ २२० ॥ स्पर्शसे सर्वांग शांत करता । माधुरीसे रसनाको नचाता । श्रवणेंद्रियसे है कहलाता । भला भला ॥ २१ ॥ वैसे है इस कथाका सुनना । कानोंका है प्रसन्न होना । संसार-दुःखका मूलसा होना । उच्चाटन ही ॥ २२ ॥ मंत्रसे यदि शत्रु मरता । कौन तलवार बांधता । दूध मधुसे रोग जाता । कौन पीवे नीम ॥ २३ ॥ वैसे मनको न मारते । इंद्रियोंको न सताते । अनायास ही मोक्ष पाते । श्रवण-मात्रसे ॥ २४ ॥ सुन सब हो प्रसन्न मन । करके गीतार्थका चिंतन । ज्ञानदेवका यह वचन । जो है निवृत्तिका दास ॥ २२५ ॥ गीता श्लोक ४२ ज्ञानेश्वरी ओवी २२५