भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 206

सभी कर्म है वह करता । कर्म बंधनमें नहीं आता । जैसे पानीमें नहीं भीगता । पद्मपत्र ॥ ५० ॥ कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिंद्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वंति संगं त्यक्त्वाऽत्मशुद्धये ॥ ११ ॥ कर्मकी विविधता-विवेचन— जो बुद्धिकी भाषा नहीं जानता । मनमें अंकुर नहीं फूटता । ऐसा व्यापार जो तनसे होता । वह शरीर कर्म ॥ ५१ ॥ इसीको स्पष्ट रूपसे कहता । जैसा बालकका कर्म है होता । योगीका कर्म वैसे ही रहता । केवल तनसे ॥ ५२ ॥ जब पंच भौतिक तन । रहता है निद्रामें लीन । कार्य करता तब मन । स्वप्न रूपमें ॥ ५३ ॥ आश्चर्य देख तू धनुर्धर । कितना है वासना विस्तार । देहको नहीं होता जागर । भोगता सुख दुःख ॥ ५४ ॥ इंद्रियोंका स्पर्श भी न करता । ऐसा व्यापार जो होता रहता । यह केवल कर्म कहलाता । मनका ही ॥ ५५ ॥ वह कर्म भी योगी करता । किंतु उससे बद्ध न होता । उसका साथ छूटा रहता । अहंकारसे ॥ ५६ ॥ जैसे होता है भ्रम हत । पिशाच स्पर्शसे जो चित्त । करता इंद्रियां चेष्टित । विकल रूपसे ॥ ५७ ॥ रूप भी है वह देखता । कानसे भी वह सुनता । शब्द भी है वह बोलता । पर बेभान हो ॥ ५८ ॥ यह जो है बिन प्रयोजन । जो कुछ वह करता जान । वह केवल कर्म है मान । इंद्रियोंका ॥ ५९ ॥ केवल इंद्रियोंसे या शरीर मन बुद्धिसे । आत्म-शुद्ध्यर्थ ही योगी करे कर्म असंग हो ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी ११८