ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 207, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वत्र फिर जाननेका । कार्य रहता जो बुद्धिका । यह कथन है हरिका । अर्जुनसे ॥ ६० ॥ बुद्धिको आधार मानकर । कर्म करते चित्त देकर । किंतु वे नैष्कर्म्यसे पर । मुक्त दीखते ॥ ६१ ॥ बुध्दिसे तन तक कहीं । अहंकारका चिन्ह भी नहीं । ये कर्म करके ही वही । शुद्ध रहते ॥ ६२ ॥ कर्तृत्वभाव बिन कर्म । होता वही सही निष्कर्म । जानते ये उसका मर्म । गुरु-गम्य जो ॥ ६३ ॥ नैष्कर्म्य भावका दर्शन— शांति-रसका अब पूर । छलके पात्रके ऊपर । बोल जो वाणीसे भी पर । होते हैं व्यक्त ॥ ६४ ॥ पराधीनता इंद्रियोंकी । मिटी है संपूर्ण जिनकी । सुननेमें योग्यता उनकी । मानना यहां ॥ ६५ ॥ रहने दो अति प्रसंग । न छोड़ो जी कथाका संग । होगा श्लोक संगति भंग । इसीलिये ॥ ६६ ॥ अनाकलन जो मनसे । प्रज्ञा-घर्षण करनेसे । वही मुझे दैव कृपासे । हुआ सहज ॥ ६७ ॥ स्वभावसे जो शब्दातीत । आया शब्दके अंतर्गत । औरोंकी रही क्या है बात । क्या कहो ॥ ६८ ॥ आग्रह विशेष श्रोताओंका । जानकर दास निवृत्तिका । कहता है संवाद दोनोंका । सुनो ध्यानसे ॥ ६९ ॥ कहता है कृष्ण अर्जुनसे । प्राप्तोंका लक्षण होता कैसे । कहता तुम्हें पूर्ण रूपसे । सुनो चित्त देकर ॥ ७० ॥ युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोति नैष्ठिकम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥ फलको तजके योगी पाता है शांति निश्चल । अ-योगी फलका भोगी वासनामें फंसा रहा ॥ १२ ॥ १९९ कर्म-संन्यासयोग