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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

सर्वत्र फिर जाननेका । कार्य रहता जो बुद्धिका । यह कथन है हरिका । अर्जुनसे ॥ ६० ॥ बुद्धिको आधार मानकर । कर्म करते चित्त देकर । किंतु वे नैष्कर्म्यसे पर । मुक्त दीखते ॥ ६१ ॥ बुध्दिसे तन तक कहीं । अहंकारका चिन्ह भी नहीं । ये कर्म करके ही वही । शुद्ध रहते ॥ ६२ ॥ कर्तृत्वभाव बिन कर्म । होता वही सही निष्कर्म । जानते ये उसका मर्म । गुरु-गम्य जो ॥ ६३ ॥ नैष्कर्म्य भावका दर्शन— शांति-रसका अब पूर । छलके पात्रके ऊपर । बोल जो वाणीसे भी पर । होते हैं व्यक्त ॥ ६४ ॥ पराधीनता इंद्रियोंकी । मिटी है संपूर्ण जिनकी । सुननेमें योग्यता उनकी । मानना यहां ॥ ६५ ॥ रहने दो अति प्रसंग । न छोड़ो जी कथाका संग । होगा श्लोक संगति भंग । इसीलिये ॥ ६६ ॥ अनाकलन जो मनसे । प्रज्ञा-घर्षण करनेसे । वही मुझे दैव कृपासे । हुआ सहज ॥ ६७ ॥ स्वभावसे जो शब्दातीत । आया शब्दके अंतर्गत । औरोंकी रही क्या है बात । क्या कहो ॥ ६८ ॥ आग्रह विशेष श्रोताओंका । जानकर दास निवृत्तिका । कहता है संवाद दोनोंका । सुनो ध्यानसे ॥ ६९ ॥ कहता है कृष्ण अर्जुनसे । प्राप्तोंका लक्षण होता कैसे । कहता तुम्हें पूर्ण रूपसे । सुनो चित्त देकर ॥ ७० ॥ युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोति नैष्ठिकम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥ फलको तजके योगी पाता है शांति निश्चल । अ-योगी फलका भोगी वासनामें फंसा रहा ॥ १२ ॥ १९९ कर्म-संन्यासयोग

संपन्न होता जो आत्म योगसे । उदासीन कर्म फल भोगसे । रमती शांति सदैव उससे । अपने आप ॥ ७१ ॥ अर्जुन जो कर्म बंधसे । अभिलाषाकी ही डोरीसे । बांधा जाता है खूंटेसे । फल भोगके ॥ ७२ ॥ सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥ करता जैसे फलकामनासे । सभी कर्म वह करता वैसे । करता है फिर पूर्ण रूपसे । उपेक्षा उसकी ॥ ७३ ॥ जिस ओर उसकी दृष्टि । होती वहां सुखकी सृष्टि । जहां वह कहता वृष्टि । होती महा-बोधकी ॥ ७४ ॥ नवद्वारके देहमें जैसे । रहकर न रहता वैसे । करके सब न करे वैसे । रहे फलत्यागी ॥ ७५ ॥ न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥ निष्काम कर्मयोगीकी महानता-- होता है जैसे सर्वेश्वर । जब चाहे तब निर्व्यापार । करता वही सब विस्तार । त्रिभुवनका ॥ ७६ ॥ कहें यदि उसको कर्ता । कर्ममें वह न डूबता । हाथ पैर लिप्त न होता । उदास वृत्तिसे ॥ ७७ ॥ योग-निद्राका भंग न होता । अ-कर्तापन नहीं मलता । दलभार जो खड़ा करता । महाभूतोंका ॥ ७८ ॥ मनसे छोड़के कर्म सुखसे संयमी सभी । नौ द्वार पुरमें देही कराता करता नहीं ॥ १३ ॥ नहीं कर्तृत्व लोगोंका न कर्म सृजता प्रभु । न कर्म-फल संयोग होता सब स्वभावसे ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी १४०

सबके जीवनमें जो बसता । किंतु किसीका कोई न होता । विश्व बनता औ' उजाड़ता । उसका कुछ नहीं ॥ ७९ ॥ नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनाऽवृतंज्ञानं तेन मुह्यंति जन्तवः ॥ १५ ॥ अशेष पाप पुण्य उसके । समीप रहते हैं विश्वके । किंतु साक्षी न होता उसके । अन्य बात क्या ॥ ८० ॥ वह रहता मूर्तिके साथ । मूर्ति रूप होकर सतत । किंतु न मलता रूप अमूर्त्त । उस पुरुषका ॥ ८१ ॥ पालता वह सृजता संहारता । चराचर सब है यही बोलता ! सुन तू यह अज्ञान ही है पार्थ । सबका यहां ॥ ८२ ॥ ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥ अज्ञान यह समूल टूटता । भ्रांतिका तम भी है दूर होता । फिर अकर्तृत्व प्रकट होता । ईश्वरका ॥ ८३ ॥ ईश्वर है यहां एक अकर्ता । तब चित्त यदि ऐसा मानता । तब वही मैं यह स्वभावता । आदिसे हूँ ॥ ८४ ॥ होता जब ऐसा विवेक चित्तमें । उसको भेद कैसा त्रिभुवनमें । देखता अपने ही अनुभवमें । विश्व है मुक्त ॥ ८५ ॥ सूर्योदय होता पूर्व दिशामें । प्रकाश होता दश दिशामें । उस समय किसी दिशामें । तम न रहता ॥ ८६ ॥ किसीका भी न लें पाप वैसे ही पुण्य भी प्रभु । अज्ञानसे ढका ज्ञान इससे जीव मोहित ॥ १५ ॥ हुवा अज्ञानका नाश जिनका आत्म ज्ञानसे । स्वच्छ दीखे पर-ब्रह्म मानो सूर्य-प्रकाश है ॥ १६ ॥ १४१ कर्म-संन्यास योग

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७ ॥ बुद्धिनिश्चयसे हो आत्मज्ञान । अपनेको ब्रह्म स्वरूप मान । ब्रह्मनिष्ठासे है तत्परायण । रहता दिनरात ॥ ८७ ॥ ऐसा भला व्यापक ज्ञान । जिनके हियमें पायास्थान । उनकी सम-दृष्टिका वर्णन । विशेष कैसे ॥ ८८ ॥ देखते अपने को जैसे । विश्वको देखते हैं वैसे । सहज कहनेमें इसे । आपत्ति क्या ॥ ८९ ॥ दैव जैसे लीलासे । न देखें दैन्य जैसे । न जाने विवेक जैसे । भ्रांतिको ॥ ९० ॥ अथवा अंधःकारका प्रकार । न देखता स्वप्नमें भी भास्कर । न आती अमृतके कान पर । मृत्युवार्ता ॥ ९१ ॥ जाने दो संताप है कैसा । न जानता चंद्र वैसा । ज्ञानी भी प्राणियोंमें वैसा । न जाता भेद ॥ ९२ ॥ विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥ यह है झींगुर यह गज । या यह चांडाल यह द्विज । या वह अन्य यह आत्मज । यह रहे कैसे ॥ ९३ ॥ या वह धेनु औ' यह श्वान । एक महान औ' दूजा हीन । इसका स्वप्नमें भी न भान । जगनेमें कैसे ॥ ९४ ॥ जहां है अहंकार भाव । वहीं है द्वेतका संभव । जहां अहंका ही अभाव । वहां विषमता कैसी ॥ ९५ ॥ बुद्धि निश्चय निष्ठाको उसीमें कर अर्पित । नहीं लेते पुनः जन्म ज्ञानसे पाप धो कर ॥ १७ ॥ विद्या विनय संपन्न द्विज गाय तथा गज । श्वान चांडाल जो सारे तत्वज्ञ सम देखते ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी १४२

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥ इसीलिये सर्वत्र सदा सम । आप ही है जो आद्य ब्रह्म । जानकर यह संपूर्ण मर्म । समदृष्टिका ॥ ९६ ॥ विषय संग नहीं छोड़ते । इंद्रिय डंडन न करते । असंगता है ये भोगते । निरिच्छामे ॥ ९७ ॥ सब लोगोंके ही अनुसार । करता है लौकिक व्यापार । किंतु अज्ञानको छोड़कर । लौकिकका ॥ ९८ ॥ जन-जनमें जैसा खेचर । होकर भी न होता गोचर । वैसे देहधारीको संसार । नहीं जानता ॥ ९९ ॥ जैसे पवन-गतिके साथ । जल पे खेले जल सतत । जानते जन उसमें द्वैत । तरंग रूप ॥ १०० ॥ वैसे नाम-रूप भिन्नताका । वैसे ब्रह्म ही सच है एक । मन साम्य हुआ है जिसका । सदा सर्वत्र ॥ १ ॥ ऐसी जिसकी समदृष्टि है । उस नरके जो लक्षण हैं । संक्षेपमें हरि कहता है । अर्जुनसे ॥ २ ॥ न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥ जैसे मृगजलका महापूर । हिला नहीं सकता गिरिवर । वैसे शुभ अशुभमें विकार । उठते नहीं ॥ ३ ॥ वही है निश्चित । समदृष्टि प्राप्त । हरि कहे पार्थ । वही ब्रह्म ॥ ४ ॥ यहीं जीत लिया जन्म स्थिर हो सम-बुद्धिमें । निर्दोष सम जो ब्रह्म उसीमें जो हुए स्थिर ॥ १९ ॥ न होता प्रियसे हर्ष अप्रियसे न व्याकुल । बुद्धि निश्चल निर्मोह ब्रह्मज्ञ ब्रह्ममें स्थिर ॥ २० ॥ १४३ कर्म-संन्यासयोग

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विंदत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥ निज वृत्तिको छोड़कर । न आता इंद्रियग्राम पर । विषय सेवन वहां पर । विचित्र ही है ॥ ५ ॥ अपार सहज-स्व-सुखमें । स्थित होनेसे अपने ही में । न झांकता कभी बाहरमें । पांडुकुमार ॥ ६ ॥ थाली है जिसकी कुमुददल । भोजन चंद्रकिरण शीतल । औ' वह चकोर खायेगा धूल । यह संभव है क्या ॥ ७ ॥ मिला जिसे निज सहज सुख । अपनेमें स्थित अंतर-सुख । उसका छूटेगा विषय सुख । अपने आप ॥ ८ ॥ वैसे भी स-कौतुक । विचार करके देख । यह जो विषय सुख । चाहता कौन ॥ ९ ॥ ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यंतवंतः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥ जिसने अन्तर्सुख नहीं देखा वही विषय सुखके पीछे पड़ते हैं— देखा नहीं जिसने निज सुख । रमता वही इंद्रियार्थी देख । बासी रोटी देख कर भी रंक । जैसे चाहता उसे ॥ १० ॥ अथवा मृग जो तृषा पीडित । भ्रमसे छोड़कर जल सोत । दौड़ते रहते मृग-जलार्थ । ऊसरमें सदा ॥ ११ ॥ जिसे नहीं निज सुखका अनुभव । औ' जिसको स्वरूपानंदका अभाव । उसको है विषय सुखका वैभव । भाते अपार ॥ १२ ॥ असंग विषयोंमें जो जानके आत्मका सुख । लीन होके ब्रह्ममें ही पाता है सुख अक्षय ॥ २१ ॥ इंद्रियोंके सभी भोग दुःख कारण केवल । उठते गिरते जान ज्ञानी न रमता वहां ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी १४४

विषयोंमें वैसा कुछ सुख है । कहने जैसा भी कुछ नहीं है । विद्युल्लतासे जैसे न होता है । प्रकाश जगतमें ॥ १३ ॥ बात वर्षा आतपमें यदि साया । करती है घने बादलकी काया । व्यर्थ है तब बांधना धनंजय । महलादिक ॥ १४ ॥ विषयोंको सुख कहना । व्यर्थकी बात है कहना । विषकंदको ही कहना । जैसा अति-मधुर ॥ १५ ॥ कहते जैसे भूमिपुत्रको मंगल । अथवा मृगजलको कहते जल । विषयानुभव कहलाता गरल । वैसे ही व्यर्थ ॥ १६ ॥ जाने वे पार्थ सब ये बोल । सर्प फनकी साया शीतल । होगी कह कहाँ तक निश्चल । मूशकको ॥ १७॥ आमिष ग्रास जैसा अर्जुन । न खाये तब तक भला मीन । वैसा विषय संग संपूर्ण । जान तू निश्चित ॥ १८ ॥ विरक्तियोंकी जो दृष्टि । देखती इसे किरीटी । पांडुरोगकी है पुष्टि । वैसे ही ॥ १९॥ तभी विषय भोगमें सुख । जानो है वह साद्यंत ही दुःख । किंतु क्या करेंगे जन मूर्ख । भोगके न थकते ॥ १२० ॥ न जानते अंतरंग बेचारे । इसीलिये सब सेवन करे । कहो पूय 'पंकके है जो कीरे । क्या करेंगे घृणा ॥ २१ ॥ दुख ही उन दुखितोंका घर । है विषय कर्दम ही दुर्दर । भोग-जल जलके जलचर । छोड़ें कैसे ॥ २२ ॥ और जो ये दुःख योनी हैं । सब निरर्थक होती हैं । यदि जीव सब विरत हैं । विषयोंमें ॥ २३ ॥ वैसे ही गर्भवासका कष्ट । या जन्म-मरणादि संकट । • अविश्रांत रूप यह बाट । चलेगा कौन ॥ २४ ॥ विषयी यदि विषय छोड़ेंगे । महादोष ये जो कहाँ रहेंगे । संसारादि नाम ये व्यर्थ होंगे । इस जगतके ॥ २५ ॥ तभी किया सुख बुद्धिसे स्वीकार । विषय सुखका है जीवन भर । कर दिखाया मिथ्याको सच कर । अविद्याजात ॥ २६ ॥ १४५ कर्म-संन्यासयोग (19)

सुन अर्जुन इस कारणसे । विष है विषय विचारनेसे । नहीं जा तू कभी इस राहसे । भूल कर भी ॥ २७ ॥ इससे ये विरक्त पुरुष । त्यजते हैं जैसे मान विष । न भाता उन्हे सुख रूप दुःख । विषयोंका कभी ॥ २८ ॥ शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३ ॥ बात नहीं ज्ञानियोंमें । विषयकी सपनेमें । देह भावको देहमें । मिटाया है ॥ २९ ॥ सदा जिसका अंतःकरण । अनुभवता सुख महान । न जाने अन्य कछु अर्जुन । विषयादिक ॥ १३० ॥ वे हैं भोगते द्वैत भावसे । पक्षीके फल चुगने जैसे । यहां संपूर्ण विसर्जनसे । भोक्ता भावके ॥ ३१ ॥ भोगमें ऐसी अवस्था आती । अहंताका परदा हटाती । महासुखालिंगन कराती । ऐक्य भावका ॥ ३२ ॥ उस आलिंगनके समय । जलमें होता जलका लय । मिट जाता है वैसा उभय । न दीखता भेद ॥ ३३ ॥ या आकाशमें खो जाता वात । मिटती वह "दो" ऐसी बात । रहता सुख मात्र शाश्वत । भोगमें वहाँ ॥ ३४ ॥ द्वैतकी भाषा मिटती है जहाँ । रहता है फिर ऐक्य ही वहाँ । रहता फिर साक्षी कौन कहाँ । जानता जो ॥ ३५ ॥ योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥ यलसे मृत्युके पूर्व देहमें जो पचा सका । काम क्रोधादिके वही योगी वही सुखी ॥ २३ ॥ प्रकाश स्थिरता सौख्य मिला अंतरमें जिन्हे । ब्रह्म ही बनके योगी पाता निर्वाण ब्रह्ममें ॥ २४ ॥ ज्ञानेश्वरी १४६

लभंते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५ ॥ इसीलिये जाने दो संपूर्ण । न बोलने जैसा बोले कौन । जानेगा सहज ज्ञानी चिह्न । आत्माराम ॥ ३६ ॥ जो हैं ऐसे सुखमें मगन । अपनेमें हैं आप अर्जुन । वे ढली हुई मूर्ति समान । समरसकी ॥ ३७ ॥ हैं वे आनंदके अनुकोर । महासुखके हैं जो अंकुर । या महाबोधके हैं विहार । बने जो ॥ ३८ ॥ वे हैं विवेकके गांव । परब्रह्मका स्वभाव । या सजे हैं अवयव । ब्रह्मविद्याके ॥ ३९ ॥ वे हैं सत्वके सात्विक । या चैतन्यके आंगिक । क्यों कर ये एक एक । बखानना है ॥ १४० ॥ विषय विस्तारकेलिये श्रीनिवृत्तिका उलाहना— जब तू संत स्तवन रचता । कथाका विचार नहीं करता । विषयांतर कर तू बोलता । सनागर ॥ ४१ ॥ कर तू रसातिरेक संकुचित । ग्रंथार्थ दीप कर-प्रज्वलित । साधु हृदय मंदिर कर प्रभात । मंगलकारक ॥ ४२ ॥ ऐसा गुरुका अव्हाइन । निवृत्तिके दासने सुन । कहता श्रीकृष्ण-वचन । वही सुनो ॥ ४३ ॥ जिसने अनंत सुखका सागर । तलका लिया है सुदृढ आधार । वह तद्रूप होकर वहीं स्थिर । हुए हैं पार्थ ॥ ४४ ॥ विशुद्ध आत्म प्रकाशमें । विश्व देखता अपनेमें । वह है ब्रह्म रूप तनमें । मानना निश्चित ॥ ४५ ॥ पाते हैं ब्रह्म-निर्वाण होते हैं क्षीण-पाप जो । असंशयी ऋषी ज्ञानी जो विश्व हितमें रत ॥ २५ ॥ १४७ कर्म-संन्यासयोग

सत्याकार वह परम । अक्षर है वह निःसीम । उस गांवके है निष्काम । अधिकारी जो ॥ ४६ ॥ महर्षियोंका जहाँ अधिकार । विरक्तोंका है अंश सुंदर । संशय रहितोंका निरंतर । फलरूप वह ॥ ४७ ॥ कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् । अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६ ॥ मानवके निःसीम स्थितिका विवेचन— विषयोंसे जिन्होंने खींचलिया । अपना चित्त आपही जीत लिया । निश्चित ही वहां लीन किया । सदैवही ॥ ४८ ॥ वह है परब्रह्म निर्वाण । आत्मज्ञानके ही कारण । उन्हींको तू पुरुष है जान । धनंजय ॥ ४९ ॥ वैसे वे कैसे हुए । देहमें ब्रह्मत्व पाए । संक्षेपमें हरि कहे । अर्जुनसे ॥ १५० ॥ स्पर्शान् कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौकृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७ ॥ वैराग्यका सहारा ले करके । तजे विषय अंतःकरणके । अंतर्मुख किये वेग मनके । शरीरमें ही ॥ ५१ ॥ सहज होती त्रिवेणीकी भेंट । पड़ती जहां भ्रूमध्यमें गांठ । वहां स्थिर करके जो दीठ । फेरते हैं ॥ ५२ ॥ छोडकर दक्षिण बाम । प्राणापान करके सम । चित्तको करने व्योम । मार्गी पार्थ ॥ ५३ ॥ जीतते काम औ' क्रोध यलसे चित्त रोधके । देखते ब्रह्म-निर्वाण ब्रह्मज्ञ सब ओरसे ॥ २६ ॥ विषयोंका बहिष्कार दृष्टि भ्रूमध्यमें स्थिर । नाकसे चलते श्वास प्राणापान करे सम ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी १४८

यतेन्द्रियमनो बुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८ ॥ जैसे मार्गादिकका सकल । पानी ले गंगा सागर तल । जाके चुनती क्या भिन्न जल । एकेक करके ॥ ५४ ॥ वैसे वासनांतरकी विवंचना । अपने आप मिटती अर्जुन । गगनमें जब लय होता मन । प्राणायामसे ॥ ५५ ॥ संसार चित्र जहाँ पड़ता । वह मन पट है फटता । सरोवर जब है सूखता । तब नहीं प्रतिबिंब ॥ ५६ ॥ मिटता जब मूलसे मनत्व । रहता वहाँ अहंकार तत्व । तभी शरीरमें जो ब्रह्मत्व । अनुभवना ॥ ५७ ॥ भोक्तारं यज्ञ तपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदम् सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शांतिमृच्छति ॥ २९ ॥ हमने जो अभी कहे हुए । देहमें ही जो ब्रह्मत्व पाए । सब वे इसी मार्गसे आए । इसीलिए ॥ ५८ ॥ यम नियमोंके डोंगर । तथा अभ्यासके सागर । अतिक्रमण कर पार । आये सब ॥ ५९ ॥ अपनेको कर निर्लेप । लेकर प्रपंचका नाप । हो गये सत्यका ही रुप । जीवनमें ॥ ६० ॥ योग-युक्तका यह उद्देश । बोला वह हृषीकेश । सुनकर अर्जुन सुदंश । हुआ चकित ॥ ६१ ॥ जाना कृष्णने यह देखकर । बोले तब पार्थसे हंसकर । हुआ न तेरा चित्त सुनकर । प्रसन्न अब ॥ ६२ ॥ जीतके मन प्रज्ञाको मुनि मोक्ष परायण । तजे इच्छा भय क्रोध सदा-सर्वत्र मुक्त है ॥ २८ ॥ भोक्ता तप यज्ञका मैं मित्र हूँ विश्व-चालक । मुझको मानके ऐसा पाता है शांति-शाश्वत ॥ २९ ॥ १४९ कर्म-संन्यासयोग

अगले अध्यायकी भूमिका रूप योग-मार्ग-दर्शन- अर्जुन कहता तब देव । पर चित्त लक्षणका ठाव । जान लिया तूने भला भाव । मनका मेरा ॥ ६३ ॥ स विवरण मेरा जो पूछना । देव ! उसीको पहले कहना । कहा जो उसीको फिर कहना । स्पष्ट रूपसे ॥ ६४ ॥ वैसे तेरे कहनेके अनुसार । पगदंडीसी है यह पानी पर । ऐसा सरल पथ जो शांगंधर । कहा अब ॥ ६५ ॥ सांख्यसे है यह सरल । हम जैसोंको जो दुर्बल । समझनेमें कुछ काल । सहना पडे ॥ ६६ ॥ इसीलिये मधुसूदन । मेरा है यह निवेदन । इसीका सविस्तर कथन । करना साद्यंत ॥ ६७ ॥ श्रीकृष्ण कहते हैं ऐसा । तुझे लगा यह भलासा । कहता हूँ सुखसे वैसा । सुनो अब ॥ ६८ ॥ अर्जुन तू यदि सुनेगा । सुनकर वैसा चलेगा । तब कहनेमें करूंगा । क्यों संकोच ॥ ६९ ॥ चित्त है जो पहले ही माताका । निमित्त है वहां मन-मानेका । अब उस अद्भुत स्नेहका । करना ही क्या ॥ १७० ॥ कहना उसे कारुण्यकी वृष्टि । अथवा स्नेहकी नूतन सृष्टि । या वह थी हरिकी अनुग्रह दृष्टि । हरिही कहें ॥ ७१ ॥ वह थी क्या अमृतसे है ढली । या प्रेम रससे मस्त थी भली । पार्थ प्रेममें उल्झी पहली । जो छूटे ही ना ॥ ७२ ॥ करना इसका जितना वर्णन । टूटेगा उतना कथाका संधान । किंतु न होगा प्रभु स्नेहका ज्ञान । शब्दसे कभी ॥ ७३ ॥ इसमें है क्या आश्चर्य महान । नहीं जिसे अपना ही ज्ञान । करेगा कैसे वह आकलन । ईश्वरका भला ॥ ७४ ॥ अबतककी कृष्णवाणीकी ध्वनिसे । लगता पार्थ प्रेममें उलझनेसे । हरि कहता है मानों बलात्कारसे । सुनो बाबा ॥ ७५ ॥ ज्ञानेश्वरी १५०

जिससे तेरा अर्जुन । चित्त करे आकलन । वैसे करूं निरूपण । विनोदसे ॥ ७६ ॥ नाम अब जिसका योग । उसका क्या है उपयोग । तथा अधिकार प्रसंग । कहूँगा तुझे ॥ ७७ ॥ ऐसा जो जो कुछ है । अब तक जो कहा है । वह सारा तुझसे है । कहूँगा अभी ॥ ७८ ॥ अब तू चित्त देकर । कथा सुन धनुर्धर । ऐसा कहता श्रीधर । अर्जुनसे ॥ ७९ ॥ श्रीकृष्ण अर्जुनके संग । न छोड़के कहेगा योग । व्यक्त करूं वह प्रसंग । कहता निवृत्ति दास ॥ १८० ॥ गीता श्लोक २९ ज्ञानेश्वरी ओवी १८०. ॐ

६ आत्म-संयमयोग छठे अध्यायकी भूमिका— राजासे कहता संजय । सुनिये अब अभिप्राय । श्रीकृष्ण कहता है वाक्य । योग-रूप ॥ १ ॥ ब्रह्म-रसका सहज पारण । देता अर्जुनको श्रीनारायण । अतिथिरूप पहुँचे उसी क्षण । हम भी वहाँ ॥ २ ॥ न जाने देवकी महत्ता । तृषित जब पानी पीता । तब स्वाद लेके देखता । अमृत है यह ॥ ३ ॥ ऐसे हमें तुम्हें हुआ है । अनायास तत्व मिला है । किंतु धृतराष्ट्र बोला है । यह न पूछा हमने ॥ ४ ॥ इस बोलसे तब संजय । समझा है राजाका हृदय । हुआ है इन्हें मोह संचय । स्व कुमारोंका ॥ ५ ॥ सोचकर वह हँसा मनमें । बुद्धि नासी है बूढेकी मोहमें । योग जो अमृतोपम क्षणमें । चला है अब ॥ ६ ॥ किंतु इन्हें यह कैसा भायेगा । जन्मांध भला कैसा देखेगा । यह सब इन्हें कौन कहेगा । सोचता संजय ॥ ७ ॥ होकर वह प्रमुदित । देकर अपना सुचित्त । श्रवण की हुई जो बात । नरनारायणमें ॥ ८ ॥ अमृतानंदकी उस तृप्तिसे । साभिप्राय अंतःकरणसे । कहेगा वह अत्यादरसे । धृतराष्ट्रको ॥ ९ ॥

गीतामें वह षष्ठीका । प्रसंग है चातुर्यका । समुद्रार्णवमें अमृतका । उदय जैसा ॥ १० ॥ वैसा गीतार्थका है सार । विवेक सिंधुका है पार । योग-वैभवका भांडार । खुला है जो ॥ ११ ॥ आदि प्रकृतिका जो विश्रांतिस्थान । हुए हैं जहां शब्द-ब्रह्म भी मौन । अंकुरित हो फैला है गीता ज्ञान । वहांसे ही ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरका देश-भाषा प्रेम— अध्याय है यह छठा । साहित्यमें अनूठा । कहता मैं सुन सुभटा । चित्त देकर ॥ १३ ॥ मेरी देशीके बोल सुंदर । वे हैं अमृतसे भी मधुर । ऐसे सरस सरल अक्षर । जोडूंगा मैं ॥ १४ ॥ जो हैं कोमलसे अति कोमल । सप्त स्वर नादसे भी विमल । टूटेगा परिमलका भी बल । इन शब्दोंसे ॥ १५ ॥ इसकी सरसताका लोभ । बनायेगा कानको भी जीभ । होगा इंद्रिय कलहारंभ । इसे सुननेमें ॥ १६ ॥ विषय है शब्द सुनना श्रवणका । जीभ कहेगी मेरा विषय रसनाका । घ्राण कहेगा भाव है परिमलका । यही होगा ॥ १७ ॥ कौतुक करेंगी काव्य रसका । देख कर आंखें शब्द चित्रका । कहेंगी खुला है रूप-कोशका । सु-प्रदर्शन ॥ १८ ॥ संपूर्ण पद आता जहां उभर । मन दौड़ आता है वहां बाहर । आगे उठ आयेंगे दोनों कर । आलिंगन करने ॥ १९ ॥ अजी ! इंद्रियां ऐसे अपने भावमें । लड़ेंगी अपनेमें रसिक-पनमें । जैसा अकेला प्रकाशता जगतमें । सहस्रकर ॥ २० ॥ शब्दोंकी है ऐसी ही व्यापकता । जानो उसकी असाधारणता । भावज्ञोंको अर्थकी व्यापकता । चिंतामणिकी ॥ २१ ॥ (20) १५३ आत्म-संयमयोग

निष्काम भावसे दिये गये शब्द-भोजनका आनंद— ऐसा है सरस शब्द भोजन । परोसा कैवल्य रसमें सान । किया है मैंने यह संतर्पण । निष्काम भावसे ॥ २२ ॥ अजी ! आत्म प्रकाश नित्य नया । उसको ही बना करके दिया । इंद्रियोंसे चुरा करके खाया । जिसने पाया वह ॥ २३ ॥ श्रवणेंद्रियोंको जिस भोजमें । बिठाना पड़ता है पंगतमें । खाना है अंतर्मुख हो मनमें । यह अमृतान्न ॥ २४ ॥ खोलना यहां शब्दका आच्छादन । करना अर्थ ब्रह्मका आस्वादन । होना फिर सुख समरसैक्य जान । सुख रूप होके ॥ २५ ॥ आयेगा जब चितमें कोमलपन । होगा तब सफल यह निरूपण । न तो होगा यह वाचा विहार मान । गूंगे बहरोंका ॥ २६ ॥ अजी ! जाने दो यह सब । श्रोताका चुनाव क्यों अब । वे सब अधिकारी अब । जो हैं निष्काम काम ॥ २७ ॥ जिनका आत्म-बोधका प्यार । करे स्वर्ग-संसार न्योच्छावर । न जाने अन्य माधुर्य अमर । यहांका जी ॥ २८ ॥ काक जैसे चांदनी न जानता । विषयासक्त “तत्व” न जानता । वैसे सदा चंद्रकिरण खाता । चकोर पक्षी ॥ २९ ॥ वैसे ज्ञानियोंका है यही आधार । अज्ञानियोंको उसमें नहीं सार । इसमें नहीं बोलना कछु और । रहा अधिक ॥ ३० ॥ प्रसंग आया तब कहे यह वचन । क्षमा करेंगे सभी संत सज्जन । कहूंगा अब मैं वह निरूपण । श्रीरंगका कहा ॥ ३१ ॥ श्री गुरुको वंदन— आता नहीं वह बुद्धिके बोधमें । नहीं आता है शब्दके परिघमें । निवृत्ति-कृपाके दीप-प्रकाशमें । देखूंगा मैं ॥ ३२ ॥ दृष्टिसे जो देखा नहीं जाता । दृष्टि बिन ही वह दीखता । ज्ञान बल जब प्राप्त होता । अतींद्रिय जो ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी १५४

धातुवादसे जो न मिलता । लोहेमें ही वह प्राप्त होता । पारस यदि हाथमें आता । दैवयोगसे ॥ ३४ ॥ सद्गुरुकी जब कृपा होती है । सभी बात तब संभव होती है । हम पर वह कृपा अपार है । कहता ज्ञानदेव ॥ ३५ ॥ इस कृपा प्रभावसे मैं बोलूंगा । शब्दमें अरूप रूप दिखाऊंगा । अतींद्रियकी प्रतीति कराऊंगा । इंद्रियोंसे ॥ ३६ ॥ सुनो यश श्री औदार्य । ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्य । ये जो छे गुणवर्य । रहते जहां ॥ ३७ ॥ वही है जो भगवंत । रहता निसंगके साथ । कहे पार्थ दत्त-चित्त । होकर सुन तू ॥ ३८ ॥ भगवान उवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १ ॥ एक ही स्थान पर पहुंचनेवाले दो मार्ग— योगी तथा संन्यासी जगतमें । एक है, भिन्न माने तू मनमें । देखें जब दोनों विचारांतमें । एक ही है ॥ ३९ ॥ छोड दो , दो नामका आभास । वही योगी औ' वही संन्यास । जैसे ब्रह्ममें ना अवकाश । वैसे दोनोंमें देख ॥ ४० ॥ अजी ! भिन्न भिन्न नामसे हैं जैसे । बुलाते एक ही पुरुषको वैसे । अथवा जाते हैं दो भिन्न मार्गसे । एक ही स्थान ॥ ४१ ॥ अथवा जैसे उदक मात्र एक । भिन्न घटमें भरनेसे अनेक । वैसे हैं योगी संन्यास विषयक । भिन्न भिन्नत्व ॥ ४२ ॥ श्री भगवानने कहा फलका आसरा छोड करे कर्तव्य कर्म जो । संन्यासी या वही योगी न जो निर्यज्ञ निष्क्रिय ॥ १ ॥ १५५ आत्म-संयमयोग

विश्वमें जो सकल समस्त । योगी है वह सुन तू पार्थ । कर्म करके भी जो आसक्त । फलमें नहीं होता ॥ ४३ ॥ भूमि जैसे उपजाती उद्बीज । बिना अहंभावके ही सहज । न करती कभी उसके बीज । अपेक्षा वह ॥ ४४ ॥ वैसे है कुल-धर्मका आधार । वर्ण धर्मानुसार है आचार । करता जो यहां स-अवसर । वही सभी ॥ ४५ ॥ करता रहता है उचित । किंतु कर्तव्य-भाव रहित । तथा फल विन्मुख हो चित । अन्तःकरणसे ॥ ४६ ॥ सुन तू अर्जुन मेरी बात । रहता ऐसा संन्यासी नित । मानो उस विश्वाससे नित । योगीश्वर ॥ ४७ ॥ तथा उचित कर्म प्रासंगिक । छोडते उसे कहके बहूक । किंतु तुरंत दूसरा ही एक । करते प्रारंभ ॥ ४८ ॥ जैसे एक लेप धोकर । लगाते दूसरा तन पर । वैसे आग्रहसे निरंतर । कष्टमें पडते ॥ ४९ ॥ अजी ! गृहस्थाश्रमका बोझ । आया जो सिरपर सहज । वहां संन्यासका रख साज । चलते आगे ॥ ५० ॥ तभी वे अग्नि सेवाको नहीं छोड़ते । कर्म-रेखाका उल्लंघन न करते । योग-सुखको हैं अनुभव करते । सहज भावसे ॥ ५१ ॥ उच्च स्थितिकी प्राप्तिकेलिये अष्टांग योगकी सीढ़ियां— यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव । न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥ योगी जो है वही संन्यासी । विश्वमें एक-वाक्यता-सी । ध्वज गाड़के कही जैसी । शास्त्रोंने सभी ॥ ५२ ॥ संन्यास जो कहा जाता उसीको योग जान तू । योगी होता नहीं कोयी बिना संकल्प त्यागके ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी १५६

जहां संन्यस्तका संकल्प टूटता । वहीं योगका सार-तत्व मिलता । अनुभवसे ऐसा है जो घड़ता । वही योगी औ' संन्यासी ॥ ५३ ॥ आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥ योगाचलके जो शिखरपर । चढ़ना चाहे वह निरंतर । कर्म-पथ सोपान धनुर्धर । न छोड़ता कभी ॥ ५४ ॥ यम नियमकी है तरायीसे । आसनादिककी पगडंडीसे । प्राणायाम टेकडी लांघनेसे । पहुंचता है वहां ॥ ५५ ॥ टूटा पहाड़ खड़ा प्रत्याहारका । फिसलता वहांसे पैर बुद्धिका । टूटता वहां बंध प्रतिज्ञाका । योगीका भी ॥ ५६ ॥ वहां अभ्यासके बलसे । वैराग्यके कसे पंजोंसे । चिपकके प्रत्याहारसे । हौलेसे चढ़ना ॥ ५७ ॥ पवन वाहनसे ऐसे । धारणाके राज पथसे । ध्यानके शिखर पारसे । होना पार ॥ ५८ ॥ फिर उस पथकी है दौड़ । मिटेगी प्रवृत्तिकी जो होड़ । होगा साध्य साधनका गाढ़ । आलिंगनैक्य ॥ ५९ ॥ रुकती जहां भविष्यकी प्रवृत्ति । मिटती है वहां भूतकी भी स्मृति । इसी भूमिका पर है होती स्थिति । कहता हूं सुन ॥ ६० ॥ इन उपायोंसे जो योगारूढ । होके परिपूर्ण अखंड प्रौढ । हुए उसके लक्षण प्रौढ़ । कहता हूं सुन ॥ ६१ ॥ यदाहि नेंद्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥ योगपे चढ़ जानेमें कर्म कारण है कहा । योगपे चढ़ जानेपे शम साधन है कहा ॥ ३ ॥ न लीप़ता कर्मसे जो विषयोंमें विरक्त है । संकल्प छूटते सारे योगारूढ हुआ जब ॥ ४ ॥ १५७ आत्म-संयमयोग

इंद्रियोंद्वारा सतत कर्म, अंतर्यामी नैष्कर्म्य— अजी ! इंद्रियोंके घरमें जिसके । आना जाना नहीं विषयोंके । तथा कक्षमें जो आत्मबोधके । सोता रहता है ॥ ६२ ॥ आघातोंके सुखदुःखसे । जगता नहीं मानस जिसके । स्पर्शसे भी विषयादिकोंके । न होता स्मरण ॥ ६३ ॥ इंद्रियां जिसकी कर्ममें । रत होती दिन रातमें । फलाशा अंतःकरणमें । न जगती कभी ॥ ६४ ॥ देहधारी वह रहकर । करता है ऐसा व्यवहार । जागृत रहकर सोकर । योगारूढ ॥ ६५ ॥ अर्जुन कहता है अनंत । सुनकर होता हूं वह चकित । कहां उसमें यह योग्यता । आती कहांसे ॥ ६६ ॥ उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥ यह स्थिति स्वयं प्राप्त करनी होती है — स्मित कर कृष्णका कहना । अचरजका तेरा बोलना । किसको किसका लेना देना । अद्वैतमें यहां ॥ ६७ ॥ अविवेककी शैय्या पर । अविद्या निद्रामें सोकर । शिशु देखे स्वप्न भयंकर । जन्म मृत्युका ॥६८ ॥ होता है फिर अकस्मात् जागृत । तब होती है स्वप्नकी व्यर्थ बात । आता है यही अनुभव सतत । अपनेको ही ॥ ६९ ॥ इसीलिये आप ही है अपना । घात करते रहते अर्जुन । चित्त देकरके देहाभिमान । जो है निरर्थक ॥ ७० ॥ उभारना अपनी आत्मा न देना गिरने कभी । आप ही अपना बंधु आपही शत्रु आपका ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी १५८