ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइंद्रियोंद्वारा सतत कर्म, अंतर्यामी नैष्कर्म्य— अजी ! इंद्रियोंके घरमें जिसके । आना जाना नहीं विषयोंके । तथा कक्षमें जो आत्मबोधके । सोता रहता है ॥ ६२ ॥ आघातोंके सुखदुःखसे । जगता नहीं मानस जिसके । स्पर्शसे भी विषयादिकोंके । न होता स्मरण ॥ ६३ ॥ इंद्रियां जिसकी कर्ममें । रत होती दिन रातमें । फलाशा अंतःकरणमें । न जगती कभी ॥ ६४ ॥ देहधारी वह रहकर । करता है ऐसा व्यवहार । जागृत रहकर सोकर । योगारूढ ॥ ६५ ॥ अर्जुन कहता है अनंत । सुनकर होता हूं वह चकित । कहां उसमें यह योग्यता । आती कहांसे ॥ ६६ ॥ उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥ यह स्थिति स्वयं प्राप्त करनी होती है — स्मित कर कृष्णका कहना । अचरजका तेरा बोलना । किसको किसका लेना देना । अद्वैतमें यहां ॥ ६७ ॥ अविवेककी शैय्या पर । अविद्या निद्रामें सोकर । शिशु देखे स्वप्न भयंकर । जन्म मृत्युका ॥६८ ॥ होता है फिर अकस्मात् जागृत । तब होती है स्वप्नकी व्यर्थ बात । आता है यही अनुभव सतत । अपनेको ही ॥ ६९ ॥ इसीलिये आप ही है अपना । घात करते रहते अर्जुन । चित्त देकरके देहाभिमान । जो है निरर्थक ॥ ७० ॥ उभारना अपनी आत्मा न देना गिरने कभी । आप ही अपना बंधु आपही शत्रु आपका ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी १५८