भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 227

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६ ॥ ऐसा सोचके अहम्‌को त्यागना । फिर वस्तुका दर्शन करना । इससे होगा कल्याण अपना । आपने किया ऐसा ॥ ७१ ॥ नहीं तो कोशकीटक जैसे । बने अपना वैरी आप जैसे । तन पर आत्म-भाव रखनेसे । बनते हैं नित ॥ ७२ ॥ प्राप्ति वेलामें दैव हीनकी । चाह होती है अंधत्वकी । तथा अपनी ही आंखोकी । मिटती दृष्टि ॥ ७३ ॥ कभी कोई कहता भ्रमसे । यह मैं नहीं चुराया ऐसे । अंतःकरणमें फंसे फंदसे । अपनी कल्पनाके ॥ ७४ ॥ देखें तो वह पहले जैसा । किंतु न जानती बुद्धि ऐसा । स्वप्नके घावसे कोई जैसा । मरता नहीं ॥ ७५ ॥ अंग भारसे झुकके जैसे । नलिका घूमती उलटके । शुक बैठे उसे पकडके । न उडता शंकासे ॥ ७६ ॥ व्यर्थ ही चहूं ओर देखता । संकोचसे नली पकडता । वही कसकर पकड़ता । पैरोंसे शुक ॥ ७७ ॥ अपनेको बंधनमें मानकर । भावनासे स्वयं जकड़कर । पैरोंसे पकड़ता है कसकर । मुक्त होकर भी ॥ ७८ ॥ कारणके बिन जकड़ा हुआ । किसीसे क्या वह बंधा हुआ । खींचने पर भी पकड़ा हुआ । रहता सतत ॥ ७९ ॥ ऐसा रिपु है अपने आप । जिसने बढ़ाये हैं संकल्प । न लेता मिथ्याभिमान आप । वह है बंधु अपना ॥ ८० ॥ जीतता अपने आप आपही अपना सखा । छोडा यदि उसे स्वैर अपना शत्रु है बना ॥ ६ ॥ १५९ आत्म-संयमयोग