भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 228

जितात्मनः प्रशांतस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्ण सुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७॥ आत्मज्ञका वर्णन — उस स्वांतःकरणजित । सकल कामनाविसे शांत । परमात्म उसके सतत । रहता सपीप ॥ ८१ ॥ जलानेसे सोना हीन कस । होता है जो विशुद्ध सरस । वैसा जीवका ब्रह्मत्व खास । मिले संकल्प लोपसे ॥ ८२ ॥ घटाकारके मिटनेपर जैसे । घटाकाश मिलनेमें आकाशसे । जाना नहीं लगता अन्यत्र जैसे । वैसे अर्जुन ॥ ८३ ॥ नाश हुआ देहाहंकारका । कारणोंके सहित मूलका । वास सर्वत्र परमात्माका । अनादि सिद्ध है ॥ ८४ ॥ शीत उष्ण आदिका द्वंद्व । औ' सुख दुःखका चुनाव । मानापमान अनुभव । नहीं वहां ॥ ८५ ॥ जिस दिशामें जाता है भास्कर । प्रकाश फैलाता है उसी ओर । जिसका स्वरूप है वही स्थिर । दीखता सतत ॥ ८६ ॥ मेघसे गिरी वर्षाकी धार । न चुभे जैसे कभी सागर । वैसे शुभाशुभ योगेश्वर । नहीं अनुभवता ॥ ८७ ॥ ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ८ ॥ जो है यह विज्ञानात्मक भव । सोचनेसे व्यर्थत्व अनुभव । फिर हुआ अपना अनुभाव । वही ज्ञान है ॥ ८८ ॥ हुवा शांत जितात्मा जो देखता ब्रह्म केवल । शीतोष्ण सुख औ' दुःख मानापमानमें नित ॥ ७ ॥ ज्ञान विज्ञानमें तृप्त स्थिर इंद्रिय जीतके । देखता सम जो योगी सोना पाषाण मृत्तिका ॥ ८ । ज्ञानेश्वरी १९०