ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमैं अमर्याद या मर्यादित । इसकी चर्चा भी हुई व्यर्थ अनुभवमें न आता द्वैत । इसीलिये ॥ ८९ ॥ शरीर है किंतु कौतुक । परब्रह्म-धाम है नेक । जिन्होंने जीत लिया देख । इंद्रियोंको ॥ ९० ॥ जो है जितेंद्रिय सहज । वही योग-युक्त समझ । वहां छोटे मोटेका दूज । कभी नहीं ॥ ९१ ॥ सोनेका मेरु पर्वत । माटीका ढेर या पात । मानता समान नित । समदृष्टिसे ॥ ९२ ॥ पृथ्वीके मोलका प्रसिद्ध । रत्न पाता जो शुद्ध । तथा पत्थर भी असिद्ध । एक जैसा ॥ ९३ ॥ सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबंधुषु । साधुष्वपिच पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९ सुहृद और शत्रु । उदास और मित्र । भेदाभेद विचित्र । कल्पना नहीं ॥ ९४ ॥ या बंधु है कौन उसका । द्वेष करे कौन किसका । मैं हूँ विश्व ऐसा जिसका । हुआ अनुभव ॥ ९५ ॥ कहो कैसे फिर उसकी दृष्टि । जाने अधम उत्तम किरीटी । दिखाये कैसे पारस कसौटी । सोना औ' लोहकी ॥ ९६ ॥ विवर्णको सुवर्ण करता पारस । वैसे चराचरसे होता समरस । बुद्धिमें समता रहती है सरस । निरंतर उसकी ॥ ९७ ॥ विश्वालंकारके प्रकार । अनेक रूपके आकार । मूलमें स्वर्ण है धनुर्धर । परब्रह्म रूप ॥ ९८ ॥ प्राप्त जिसे ऐसा उत्तम ज्ञान । नाना प्रकार देख असमान । नहीं फंसता वह बुद्धिमान । आकार-जालमें ॥ ९९ ॥ शत्रु मित्र उदासीन मध्यस्थ आप्त औ' पर । साधु या पातकीमें भी सम-बुद्धि विशिष्ट सो ॥ ९ ॥ १६१ आत्मसंयम योग (21)