ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजहां संन्यस्तका संकल्प टूटता । वहीं योगका सार-तत्व मिलता । अनुभवसे ऐसा है जो घड़ता । वही योगी औ' संन्यासी ॥ ५३ ॥ आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥ योगाचलके जो शिखरपर । चढ़ना चाहे वह निरंतर । कर्म-पथ सोपान धनुर्धर । न छोड़ता कभी ॥ ५४ ॥ यम नियमकी है तरायीसे । आसनादिककी पगडंडीसे । प्राणायाम टेकडी लांघनेसे । पहुंचता है वहां ॥ ५५ ॥ टूटा पहाड़ खड़ा प्रत्याहारका । फिसलता वहांसे पैर बुद्धिका । टूटता वहां बंध प्रतिज्ञाका । योगीका भी ॥ ५६ ॥ वहां अभ्यासके बलसे । वैराग्यके कसे पंजोंसे । चिपकके प्रत्याहारसे । हौलेसे चढ़ना ॥ ५७ ॥ पवन वाहनसे ऐसे । धारणाके राज पथसे । ध्यानके शिखर पारसे । होना पार ॥ ५८ ॥ फिर उस पथकी है दौड़ । मिटेगी प्रवृत्तिकी जो होड़ । होगा साध्य साधनका गाढ़ । आलिंगनैक्य ॥ ५९ ॥ रुकती जहां भविष्यकी प्रवृत्ति । मिटती है वहां भूतकी भी स्मृति । इसी भूमिका पर है होती स्थिति । कहता हूं सुन ॥ ६० ॥ इन उपायोंसे जो योगारूढ । होके परिपूर्ण अखंड प्रौढ । हुए उसके लक्षण प्रौढ़ । कहता हूं सुन ॥ ६१ ॥ यदाहि नेंद्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥ योगपे चढ़ जानेमें कर्म कारण है कहा । योगपे चढ़ जानेपे शम साधन है कहा ॥ ३ ॥ न लीप़ता कर्मसे जो विषयोंमें विरक्त है । संकल्प छूटते सारे योगारूढ हुआ जब ॥ ४ ॥ १५७ आत्म-संयमयोग