ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयोंमें वैसा कुछ सुख है । कहने जैसा भी कुछ नहीं है । विद्युल्लतासे जैसे न होता है । प्रकाश जगतमें ॥ १३ ॥ बात वर्षा आतपमें यदि साया । करती है घने बादलकी काया । व्यर्थ है तब बांधना धनंजय । महलादिक ॥ १४ ॥ विषयोंको सुख कहना । व्यर्थकी बात है कहना । विषकंदको ही कहना । जैसा अति-मधुर ॥ १५ ॥ कहते जैसे भूमिपुत्रको मंगल । अथवा मृगजलको कहते जल । विषयानुभव कहलाता गरल । वैसे ही व्यर्थ ॥ १६ ॥ जाने वे पार्थ सब ये बोल । सर्प फनकी साया शीतल । होगी कह कहाँ तक निश्चल । मूशकको ॥ १७॥ आमिष ग्रास जैसा अर्जुन । न खाये तब तक भला मीन । वैसा विषय संग संपूर्ण । जान तू निश्चित ॥ १८ ॥ विरक्तियोंकी जो दृष्टि । देखती इसे किरीटी । पांडुरोगकी है पुष्टि । वैसे ही ॥ १९॥ तभी विषय भोगमें सुख । जानो है वह साद्यंत ही दुःख । किंतु क्या करेंगे जन मूर्ख । भोगके न थकते ॥ १२० ॥ न जानते अंतरंग बेचारे । इसीलिये सब सेवन करे । कहो पूय 'पंकके है जो कीरे । क्या करेंगे घृणा ॥ २१ ॥ दुख ही उन दुखितोंका घर । है विषय कर्दम ही दुर्दर । भोग-जल जलके जलचर । छोड़ें कैसे ॥ २२ ॥ और जो ये दुःख योनी हैं । सब निरर्थक होती हैं । यदि जीव सब विरत हैं । विषयोंमें ॥ २३ ॥ वैसे ही गर्भवासका कष्ट । या जन्म-मरणादि संकट । • अविश्रांत रूप यह बाट । चलेगा कौन ॥ २४ ॥ विषयी यदि विषय छोड़ेंगे । महादोष ये जो कहाँ रहेंगे । संसारादि नाम ये व्यर्थ होंगे । इस जगतके ॥ २५ ॥ तभी किया सुख बुद्धिसे स्वीकार । विषय सुखका है जीवन भर । कर दिखाया मिथ्याको सच कर । अविद्याजात ॥ २६ ॥ १४५ कर्म-संन्यासयोग (19)