भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विंदत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥ निज वृत्तिको छोड़कर । न आता इंद्रियग्राम पर । विषय सेवन वहां पर । विचित्र ही है ॥ ५ ॥ अपार सहज-स्व-सुखमें । स्थित होनेसे अपने ही में । न झांकता कभी बाहरमें । पांडुकुमार ॥ ६ ॥ थाली है जिसकी कुमुददल । भोजन चंद्रकिरण शीतल । औ' वह चकोर खायेगा धूल । यह संभव है क्या ॥ ७ ॥ मिला जिसे निज सहज सुख । अपनेमें स्थित अंतर-सुख । उसका छूटेगा विषय सुख । अपने आप ॥ ८ ॥ वैसे भी स-कौतुक । विचार करके देख । यह जो विषय सुख । चाहता कौन ॥ ९ ॥ ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यंतवंतः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥ जिसने अन्तर्सुख नहीं देखा वही विषय सुखके पीछे पड़ते हैं— देखा नहीं जिसने निज सुख । रमता वही इंद्रियार्थी देख । बासी रोटी देख कर भी रंक । जैसे चाहता उसे ॥ १० ॥ अथवा मृग जो तृषा पीडित । भ्रमसे छोड़कर जल सोत । दौड़ते रहते मृग-जलार्थ । ऊसरमें सदा ॥ ११ ॥ जिसे नहीं निज सुखका अनुभव । औ' जिसको स्वरूपानंदका अभाव । उसको है विषय सुखका वैभव । भाते अपार ॥ १२ ॥ असंग विषयोंमें जो जानके आत्मका सुख । लीन होके ब्रह्ममें ही पाता है सुख अक्षय ॥ २१ ॥ इंद्रियोंके सभी भोग दुःख कारण केवल । उठते गिरते जान ज्ञानी न रमता वहां ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी १४४