ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥ इसीलिये सर्वत्र सदा सम । आप ही है जो आद्य ब्रह्म । जानकर यह संपूर्ण मर्म । समदृष्टिका ॥ ९६ ॥ विषय संग नहीं छोड़ते । इंद्रिय डंडन न करते । असंगता है ये भोगते । निरिच्छामे ॥ ९७ ॥ सब लोगोंके ही अनुसार । करता है लौकिक व्यापार । किंतु अज्ञानको छोड़कर । लौकिकका ॥ ९८ ॥ जन-जनमें जैसा खेचर । होकर भी न होता गोचर । वैसे देहधारीको संसार । नहीं जानता ॥ ९९ ॥ जैसे पवन-गतिके साथ । जल पे खेले जल सतत । जानते जन उसमें द्वैत । तरंग रूप ॥ १०० ॥ वैसे नाम-रूप भिन्नताका । वैसे ब्रह्म ही सच है एक । मन साम्य हुआ है जिसका । सदा सर्वत्र ॥ १ ॥ ऐसी जिसकी समदृष्टि है । उस नरके जो लक्षण हैं । संक्षेपमें हरि कहता है । अर्जुनसे ॥ २ ॥ न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥ जैसे मृगजलका महापूर । हिला नहीं सकता गिरिवर । वैसे शुभ अशुभमें विकार । उठते नहीं ॥ ३ ॥ वही है निश्चित । समदृष्टि प्राप्त । हरि कहे पार्थ । वही ब्रह्म ॥ ४ ॥ यहीं जीत लिया जन्म स्थिर हो सम-बुद्धिमें । निर्दोष सम जो ब्रह्म उसीमें जो हुए स्थिर ॥ १९ ॥ न होता प्रियसे हर्ष अप्रियसे न व्याकुल । बुद्धि निश्चल निर्मोह ब्रह्मज्ञ ब्रह्ममें स्थिर ॥ २० ॥ १४३ कर्म-संन्यासयोग