ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७ ॥ बुद्धिनिश्चयसे हो आत्मज्ञान । अपनेको ब्रह्म स्वरूप मान । ब्रह्मनिष्ठासे है तत्परायण । रहता दिनरात ॥ ८७ ॥ ऐसा भला व्यापक ज्ञान । जिनके हियमें पायास्थान । उनकी सम-दृष्टिका वर्णन । विशेष कैसे ॥ ८८ ॥ देखते अपने को जैसे । विश्वको देखते हैं वैसे । सहज कहनेमें इसे । आपत्ति क्या ॥ ८९ ॥ दैव जैसे लीलासे । न देखें दैन्य जैसे । न जाने विवेक जैसे । भ्रांतिको ॥ ९० ॥ अथवा अंधःकारका प्रकार । न देखता स्वप्नमें भी भास्कर । न आती अमृतके कान पर । मृत्युवार्ता ॥ ९१ ॥ जाने दो संताप है कैसा । न जानता चंद्र वैसा । ज्ञानी भी प्राणियोंमें वैसा । न जाता भेद ॥ ९२ ॥ विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥ यह है झींगुर यह गज । या यह चांडाल यह द्विज । या वह अन्य यह आत्मज । यह रहे कैसे ॥ ९३ ॥ या वह धेनु औ' यह श्वान । एक महान औ' दूजा हीन । इसका स्वप्नमें भी न भान । जगनेमें कैसे ॥ ९४ ॥ जहां है अहंकार भाव । वहीं है द्वेतका संभव । जहां अहंका ही अभाव । वहां विषमता कैसी ॥ ९५ ॥ बुद्धि निश्चय निष्ठाको उसीमें कर अर्पित । नहीं लेते पुनः जन्म ज्ञानसे पाप धो कर ॥ १७ ॥ विद्या विनय संपन्न द्विज गाय तथा गज । श्वान चांडाल जो सारे तत्वज्ञ सम देखते ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी १४२