भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209

सबके जीवनमें जो बसता । किंतु किसीका कोई न होता । विश्व बनता औ' उजाड़ता । उसका कुछ नहीं ॥ ७९ ॥ नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनाऽवृतंज्ञानं तेन मुह्यंति जन्तवः ॥ १५ ॥ अशेष पाप पुण्य उसके । समीप रहते हैं विश्वके । किंतु साक्षी न होता उसके । अन्य बात क्या ॥ ८० ॥ वह रहता मूर्तिके साथ । मूर्ति रूप होकर सतत । किंतु न मलता रूप अमूर्त्त । उस पुरुषका ॥ ८१ ॥ पालता वह सृजता संहारता । चराचर सब है यही बोलता ! सुन तू यह अज्ञान ही है पार्थ । सबका यहां ॥ ८२ ॥ ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥ अज्ञान यह समूल टूटता । भ्रांतिका तम भी है दूर होता । फिर अकर्तृत्व प्रकट होता । ईश्वरका ॥ ८३ ॥ ईश्वर है यहां एक अकर्ता । तब चित्त यदि ऐसा मानता । तब वही मैं यह स्वभावता । आदिसे हूँ ॥ ८४ ॥ होता जब ऐसा विवेक चित्तमें । उसको भेद कैसा त्रिभुवनमें । देखता अपने ही अनुभवमें । विश्व है मुक्त ॥ ८५ ॥ सूर्योदय होता पूर्व दिशामें । प्रकाश होता दश दिशामें । उस समय किसी दिशामें । तम न रहता ॥ ८६ ॥ किसीका भी न लें पाप वैसे ही पुण्य भी प्रभु । अज्ञानसे ढका ज्ञान इससे जीव मोहित ॥ १५ ॥ हुवा अज्ञानका नाश जिनका आत्म ज्ञानसे । स्वच्छ दीखे पर-ब्रह्म मानो सूर्य-प्रकाश है ॥ १६ ॥ १४१ कर्म-संन्यास योग