भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 208

संपन्न होता जो आत्म योगसे । उदासीन कर्म फल भोगसे । रमती शांति सदैव उससे । अपने आप ॥ ७१ ॥ अर्जुन जो कर्म बंधसे । अभिलाषाकी ही डोरीसे । बांधा जाता है खूंटेसे । फल भोगके ॥ ७२ ॥ सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥ करता जैसे फलकामनासे । सभी कर्म वह करता वैसे । करता है फिर पूर्ण रूपसे । उपेक्षा उसकी ॥ ७३ ॥ जिस ओर उसकी दृष्टि । होती वहां सुखकी सृष्टि । जहां वह कहता वृष्टि । होती महा-बोधकी ॥ ७४ ॥ नवद्वारके देहमें जैसे । रहकर न रहता वैसे । करके सब न करे वैसे । रहे फलत्यागी ॥ ७५ ॥ न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥ निष्काम कर्मयोगीकी महानता-- होता है जैसे सर्वेश्वर । जब चाहे तब निर्व्यापार । करता वही सब विस्तार । त्रिभुवनका ॥ ७६ ॥ कहें यदि उसको कर्ता । कर्ममें वह न डूबता । हाथ पैर लिप्त न होता । उदास वृत्तिसे ॥ ७७ ॥ योग-निद्राका भंग न होता । अ-कर्तापन नहीं मलता । दलभार जो खड़ा करता । महाभूतोंका ॥ ७८ ॥ मनसे छोड़के कर्म सुखसे संयमी सभी । नौ द्वार पुरमें देही कराता करता नहीं ॥ १३ ॥ नहीं कर्तृत्व लोगोंका न कर्म सृजता प्रभु । न कर्म-फल संयोग होता सब स्वभावसे ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी १४०