ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुन अर्जुन इस कारणसे । विष है विषय विचारनेसे । नहीं जा तू कभी इस राहसे । भूल कर भी ॥ २७ ॥ इससे ये विरक्त पुरुष । त्यजते हैं जैसे मान विष । न भाता उन्हे सुख रूप दुःख । विषयोंका कभी ॥ २८ ॥ शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३ ॥ बात नहीं ज्ञानियोंमें । विषयकी सपनेमें । देह भावको देहमें । मिटाया है ॥ २९ ॥ सदा जिसका अंतःकरण । अनुभवता सुख महान । न जाने अन्य कछु अर्जुन । विषयादिक ॥ १३० ॥ वे हैं भोगते द्वैत भावसे । पक्षीके फल चुगने जैसे । यहां संपूर्ण विसर्जनसे । भोक्ता भावके ॥ ३१ ॥ भोगमें ऐसी अवस्था आती । अहंताका परदा हटाती । महासुखालिंगन कराती । ऐक्य भावका ॥ ३२ ॥ उस आलिंगनके समय । जलमें होता जलका लय । मिट जाता है वैसा उभय । न दीखता भेद ॥ ३३ ॥ या आकाशमें खो जाता वात । मिटती वह "दो" ऐसी बात । रहता सुख मात्र शाश्वत । भोगमें वहाँ ॥ ३४ ॥ द्वैतकी भाषा मिटती है जहाँ । रहता है फिर ऐक्य ही वहाँ । रहता फिर साक्षी कौन कहाँ । जानता जो ॥ ३५ ॥ योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥ यलसे मृत्युके पूर्व देहमें जो पचा सका । काम क्रोधादिके वही योगी वही सुखी ॥ २३ ॥ प्रकाश स्थिरता सौख्य मिला अंतरमें जिन्हे । ब्रह्म ही बनके योगी पाता निर्वाण ब्रह्ममें ॥ २४ ॥ ज्ञानेश्वरी १४६