भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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गीतामें वह षष्ठीका । प्रसंग है चातुर्यका । समुद्रार्णवमें अमृतका । उदय जैसा ॥ १० ॥ वैसा गीतार्थका है सार । विवेक सिंधुका है पार । योग-वैभवका भांडार । खुला है जो ॥ ११ ॥ आदि प्रकृतिका जो विश्रांतिस्थान । हुए हैं जहां शब्द-ब्रह्म भी मौन । अंकुरित हो फैला है गीता ज्ञान । वहांसे ही ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरका देश-भाषा प्रेम— अध्याय है यह छठा । साहित्यमें अनूठा । कहता मैं सुन सुभटा । चित्त देकर ॥ १३ ॥ मेरी देशीके बोल सुंदर । वे हैं अमृतसे भी मधुर । ऐसे सरस सरल अक्षर । जोडूंगा मैं ॥ १४ ॥ जो हैं कोमलसे अति कोमल । सप्त स्वर नादसे भी विमल । टूटेगा परिमलका भी बल । इन शब्दोंसे ॥ १५ ॥ इसकी सरसताका लोभ । बनायेगा कानको भी जीभ । होगा इंद्रिय कलहारंभ । इसे सुननेमें ॥ १६ ॥ विषय है शब्द सुनना श्रवणका । जीभ कहेगी मेरा विषय रसनाका । घ्राण कहेगा भाव है परिमलका । यही होगा ॥ १७ ॥ कौतुक करेंगी काव्य रसका । देख कर आंखें शब्द चित्रका । कहेंगी खुला है रूप-कोशका । सु-प्रदर्शन ॥ १८ ॥ संपूर्ण पद आता जहां उभर । मन दौड़ आता है वहां बाहर । आगे उठ आयेंगे दोनों कर । आलिंगन करने ॥ १९ ॥ अजी ! इंद्रियां ऐसे अपने भावमें । लड़ेंगी अपनेमें रसिक-पनमें । जैसा अकेला प्रकाशता जगतमें । सहस्रकर ॥ २० ॥ शब्दोंकी है ऐसी ही व्यापकता । जानो उसकी असाधारणता । भावज्ञोंको अर्थकी व्यापकता । चिंतामणिकी ॥ २१ ॥ (20) १५३ आत्म-संयमयोग

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