ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिष्काम भावसे दिये गये शब्द-भोजनका आनंद— ऐसा है सरस शब्द भोजन । परोसा कैवल्य रसमें सान । किया है मैंने यह संतर्पण । निष्काम भावसे ॥ २२ ॥ अजी ! आत्म प्रकाश नित्य नया । उसको ही बना करके दिया । इंद्रियोंसे चुरा करके खाया । जिसने पाया वह ॥ २३ ॥ श्रवणेंद्रियोंको जिस भोजमें । बिठाना पड़ता है पंगतमें । खाना है अंतर्मुख हो मनमें । यह अमृतान्न ॥ २४ ॥ खोलना यहां शब्दका आच्छादन । करना अर्थ ब्रह्मका आस्वादन । होना फिर सुख समरसैक्य जान । सुख रूप होके ॥ २५ ॥ आयेगा जब चितमें कोमलपन । होगा तब सफल यह निरूपण । न तो होगा यह वाचा विहार मान । गूंगे बहरोंका ॥ २६ ॥ अजी ! जाने दो यह सब । श्रोताका चुनाव क्यों अब । वे सब अधिकारी अब । जो हैं निष्काम काम ॥ २७ ॥ जिनका आत्म-बोधका प्यार । करे स्वर्ग-संसार न्योच्छावर । न जाने अन्य माधुर्य अमर । यहांका जी ॥ २८ ॥ काक जैसे चांदनी न जानता । विषयासक्त “तत्व” न जानता । वैसे सदा चंद्रकिरण खाता । चकोर पक्षी ॥ २९ ॥ वैसे ज्ञानियोंका है यही आधार । अज्ञानियोंको उसमें नहीं सार । इसमें नहीं बोलना कछु और । रहा अधिक ॥ ३० ॥ प्रसंग आया तब कहे यह वचन । क्षमा करेंगे सभी संत सज्जन । कहूंगा अब मैं वह निरूपण । श्रीरंगका कहा ॥ ३१ ॥ श्री गुरुको वंदन— आता नहीं वह बुद्धिके बोधमें । नहीं आता है शब्दके परिघमें । निवृत्ति-कृपाके दीप-प्रकाशमें । देखूंगा मैं ॥ ३२ ॥ दृष्टिसे जो देखा नहीं जाता । दृष्टि बिन ही वह दीखता । ज्ञान बल जब प्राप्त होता । अतींद्रिय जो ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी १५४