भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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धातुवादसे जो न मिलता । लोहेमें ही वह प्राप्त होता । पारस यदि हाथमें आता । दैवयोगसे ॥ ३४ ॥ सद्गुरुकी जब कृपा होती है । सभी बात तब संभव होती है । हम पर वह कृपा अपार है । कहता ज्ञानदेव ॥ ३५ ॥ इस कृपा प्रभावसे मैं बोलूंगा । शब्दमें अरूप रूप दिखाऊंगा । अतींद्रियकी प्रतीति कराऊंगा । इंद्रियोंसे ॥ ३६ ॥ सुनो यश श्री औदार्य । ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्य । ये जो छे गुणवर्य । रहते जहां ॥ ३७ ॥ वही है जो भगवंत । रहता निसंगके साथ । कहे पार्थ दत्त-चित्त । होकर सुन तू ॥ ३८ ॥ भगवान उवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १ ॥ एक ही स्थान पर पहुंचनेवाले दो मार्ग— योगी तथा संन्यासी जगतमें । एक है, भिन्न माने तू मनमें । देखें जब दोनों विचारांतमें । एक ही है ॥ ३९ ॥ छोड दो , दो नामका आभास । वही योगी औ' वही संन्यास । जैसे ब्रह्ममें ना अवकाश । वैसे दोनोंमें देख ॥ ४० ॥ अजी ! भिन्न भिन्न नामसे हैं जैसे । बुलाते एक ही पुरुषको वैसे । अथवा जाते हैं दो भिन्न मार्गसे । एक ही स्थान ॥ ४१ ॥ अथवा जैसे उदक मात्र एक । भिन्न घटमें भरनेसे अनेक । वैसे हैं योगी संन्यास विषयक । भिन्न भिन्नत्व ॥ ४२ ॥ श्री भगवानने कहा फलका आसरा छोड करे कर्तव्य कर्म जो । संन्यासी या वही योगी न जो निर्यज्ञ निष्क्रिय ॥ १ ॥ १५५ आत्म-संयमयोग

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