ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ आत्म-संयमयोग छठे अध्यायकी भूमिका— राजासे कहता संजय । सुनिये अब अभिप्राय । श्रीकृष्ण कहता है वाक्य । योग-रूप ॥ १ ॥ ब्रह्म-रसका सहज पारण । देता अर्जुनको श्रीनारायण । अतिथिरूप पहुँचे उसी क्षण । हम भी वहाँ ॥ २ ॥ न जाने देवकी महत्ता । तृषित जब पानी पीता । तब स्वाद लेके देखता । अमृत है यह ॥ ३ ॥ ऐसे हमें तुम्हें हुआ है । अनायास तत्व मिला है । किंतु धृतराष्ट्र बोला है । यह न पूछा हमने ॥ ४ ॥ इस बोलसे तब संजय । समझा है राजाका हृदय । हुआ है इन्हें मोह संचय । स्व कुमारोंका ॥ ५ ॥ सोचकर वह हँसा मनमें । बुद्धि नासी है बूढेकी मोहमें । योग जो अमृतोपम क्षणमें । चला है अब ॥ ६ ॥ किंतु इन्हें यह कैसा भायेगा । जन्मांध भला कैसा देखेगा । यह सब इन्हें कौन कहेगा । सोचता संजय ॥ ७ ॥ होकर वह प्रमुदित । देकर अपना सुचित्त । श्रवण की हुई जो बात । नरनारायणमें ॥ ८ ॥ अमृतानंदकी उस तृप्तिसे । साभिप्राय अंतःकरणसे । कहेगा वह अत्यादरसे । धृतराष्ट्रको ॥ ९ ॥