ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अध्याय १०: विभूतियोग
जानता है सभी नीति । वैद्यकमें खासी गति । काव्यमें है पक्व-मति । तथा न्यायमें भी ॥ ३१ ॥ होता स्मृतियोंका तज्ञ । गारुडी विद्याका मर्मज्ञ । शब्दकोशका महा-प्राज्ञ । माना कोश है दास ॥ ३२ ॥ व्याकरण-ज्ञानमें अगाध । तर्क-शास्त्रका है पूर्ण बोध । किंतु आत्म-ज्ञानमें जन्मांध । होता है धनंजय ॥ ३३ ॥ इस एकके बिन जो सभी शास्त्र । जानता वह मूल सिद्धांत-सूत्र । जलने दो लगा है मूला नक्षत्र । न देखो वह ॥ ३४ ॥ मोर-पंखके शरीर पर । उसपे होती आंख सुंदर । दृष्टि नहीं होती एक पर । वैसा है यह ॥ ३५ ॥ अध्यात्म-ज्ञानके बिन सब व्यर्थ— यदि परमाणु जितना । संजीवनी जड पा जाना । अन्य औषध क्या करना । ढेरोंका जो ॥ ३६ ॥ आयुष्य बिन सब लक्षण । अथवा शरीर बिन आभूषण । बरात जैसे वैभव-पूर्ण । दूल्हा बिन निंदित ॥ ३७ ॥ सब शास्त्र वैसे ज्ञान । सर्वथा है अप्रमाण । अध्यात्म ज्ञान बिन । स्वयंपूर्ण जो ॥ ३८ ॥ इसीलिये जान तू अर्जुन । जो है अध्यात्म-बोध विहीन । उसको कहते प्राज्ञ जान । शास्त्र-मूढ ॥ ३९ ॥ मानो उसका जो शरीर । अज्ञान-बीजका अंकुर । उसका हुवा जो विस्तार । अज्ञान-वृक्ष ॥ ८४० ॥ होते हैं उसके सभी बोल । आज्ञानके खिले हुये फूल । फले तो उसके पुण्य-फल । अज्ञानके ही ॥ ४१ ॥ अध्यात्ममें जिसे रस नहीं । उसको ज्ञेय दीखता नहीं । यह कहना अवश्य नहीं । जान तू यह ॥ ४२ ॥ ४९९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इस तीरको भी जो न पाता । तीर देखके भी भाग जाता । पैल तीरकी वह क्या वार्ता । जानेगा भला ॥ ४३ ॥ या देहरी पर ही उसका सिर । दबाया कंगूरमें जकडकर । देखेगा कैसा वह पांडुकुमार । अंर्तगृहकी बात ॥ ४४ ॥ आत्म-ज्ञानकी पहचान । नहीं है उसको अर्जुन । जानेगा कैसा सत्य-ज्ञान । विषय भी वह ॥ ४५ ॥ तभी इसमें विशेष । तत्व नहीं है देख । कहना तुझे शेष । रहा ही क्या ॥ ४६ ॥ जैसे स-गर्भाको पगेसा अन्न । उससे बढता गर्भका तन । पिछले पदमें किया वर्णन । वही है सब ॥ ४७ ॥ अंधेको दिया जब निमंत्रण । उसके संग आता स-नयन । जाने है अज्ञान लक्षण । ज्ञान भी आया ॥ ४८ ॥ ज्ञेयकी पूर्व-पीठिका— तभी तो यहां अर्जुन । कहे अज्ञान लक्षण । अमानित्वादिके जान । हैं विरुद्ध जो ॥ ४९ ॥ ज्ञानके जो अठराह लक्षण । उसके उलटकर दर्शन । करनेसे दीखेगा अज्ञान । सहज भावसे ॥ ८५० ॥ पीछे श्लोकार्धमें एक । कहा है श्रीकृष्णने देख । उलटके ज्ञानको देख । वही है अज्ञान ॥ ५१ ॥ तभी इस पद्धतिको स्वीकार । किया है उस अर्थका विस्तार । न तो दूधमें मिलाकर नीर । न फैलाता ऐसे ॥ ५२ ॥ वैसे दिखायी नहीं वाचालता । शब्दकी सीमामें हूं मैं स्पष्टता । बना मूल-ध्वनिके विस्तारार्थ । निमित्तमात्र ॥ ५३ ॥ तब कहते हैं श्रोता जन । अनावश्यक स्व-समर्थन । विस्तार भीति है अकारण । कवि पोषक अपनी ॥ ५४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५००
आज्ञा देता है धरणीधर । मेरा अभिप्राय स्पष्ट कर । छिपा रखा शब्दके भीतर । हमने यहां ॥ ५५ ॥ परमात्माका मनोरथ । हमें दिखाता है तू मूर्त । यह कहने पर चित्त । उमड आयेगा ॥ ५६ ॥ इसलिये यह नहीं कहते । किंतु कहनेसे नहीं रहते । श्रवण-सुखसे हैं हम पाते । ज्ञान-नौका यहां ॥ ५७ ॥ अब तू इस पर । कहता जो श्रीधर । हमें कह सत्वर । जो यथार्थ ॥ ५८ ॥ सुन कर यह संतोंका बचन । बोले निवृत्तिदास मुदित मन । करो ध्यानसे चित्त देके श्रवण । कहा जो श्रीहरिने ॥ ५९ ॥ कहते हैं तुझको अर्जुन । यह चिन्ह समुच्चय पूर्ण । श्रवण किया यह अज्ञान । मूर्ति रूप था ॥ ८६० ॥ अज्ञानसे मुडकर । ज्ञानमें पांडुकुमार । निश्चय कर सत्वर । दृढतासे तू ॥ ६१ ॥ उस ज्ञानसे अर्जुन । होगा ज्ञेयका दर्शन । सुन अर्जुनका मन । करता जिज्ञासा ॥ ६२ ॥ तब वह सर्वज्ञ-श्रेष्ठ । जानके यह भाव स्पष्ट । अभिप्राय कहके तुष्ट । करेगा ज्ञेयका ॥ ६३ ॥ ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥ ज्ञेयका स्वरूप- जिसको यह ज्ञेय कहना । उसका कारण है इतना । वह जो कभी ज्ञानके बिना । जाना नहीं जाता ॥ ६४ ॥ कहूँगा ज्ञेय मैं सारा पानेसे अमृतत्व है । अनादि जो पर ब्रह्म है परे अस्तिनास्तिके ॥ १२ ॥ ५०१ क्षेत्र--क्षेत्रज्ञयोग
तथा उसको जानने पर । रहता नहीं कर्तव्य फिर । उससे मिलती निरंतर । तद्रूपता ॥ ६५ ॥ उस ज्ञान प्राप्तिके नंतर । संसार रहता तट पर । डूबा ही रहता निरंतर । नित्यानंदमें ॥ ६६ ॥ ज्ञान होता है ऐसे । आदी न होती जिसे । पर-ब्रह्म है ऐसे । कहते उसको ॥ ६७ ॥ इसको यदि नहीं कहते । विश्वाकारसे इसे देखते । यदि इसे विश्व ही कहते । विश्व है माया ॥ ६८ ॥ रूप वर्ण तथा व्यक्ति । नहीं दृश्य द्रष्टा स्थिति । वह है ऐसी जो मति । होगी किसकी ॥ ६९ ॥ और यदि यह नहीं है । महदादि तत्व कैसे हैं । कहांसे स्फुरण होते हैं । यह प्रश्न उठता ॥ ८७० ॥ तभी हैं अस्ति नास्ति ये जोड । देख यह मूक होते फोल । विचारकी चहल पहल । रुक जाती है ॥ ७१ ॥ जैसे घटका मटकाकार । बन रहती पृथ्वी साकार । वैसे सबमें सब होकर । रहता ज्ञेय ॥ ७२ ॥ सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥ सभी स्थल-कालमें उनसे । भिन्न नहीं होते स्थल-कालसे । होती स्थूल सूक्ष्म क्रिया भूतोंसे । हाथोंसे उनके ॥ ७३ ॥ उसको इसी कारणसे । कहते विश्वबाहू ऐसे । जो सर्वत्र सर्व-रूपसे । करता सदैव ॥ ७४ ॥
दीखते पद हस्तादि सर्वत्र उसके शिर । मुख आंख तथा कान सबको घेरके रहे ॥ १३ ॥ ज्ञानेश्वरी ५०२
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में सटीक लिप्यंतरण है:
तथा वह सर्वत्र समस्त । स्थानमें होता है प्राप्त । सभी रूपमें पूर्ण-दर्शित । सो विश्वतःपाद ॥ ७५ ॥ सविताको जैसे नहीं नयन । अवयव में दीखते हैं भिन्न । किंतु करता सबका दर्शन । वह स्वरूप ॥ ७६ ॥ इसीलिये वह विश्वतचक्षु । वास्तवमें होकर जो अचक्षु । कहलाता बोलनेमें जो वृक्ष । वेदसे भी ॥ ७७ ॥ जो है सबके शिर पर । रहता है नित्य तत्पर । आत्म-सत्तासे होके स्थिर । तभी है विश्वमूर्ध्ने ॥ ७८ ॥ जैसे संपूर्ण मूर्ति ही मुख । हुताशनका वैसे है देख । वैसे है सर्व-मुखसे अशेष । है वह भोक्ता ॥ ७९ ॥ इसीलिये सुन पार्थ । विश्वतोमुख व्यवस्था । चली आयी है वाक्प्रथा । श्रुतिसे ही ॥ ८८० ॥ वस्तु-मात्रमें गगन । जैसे रहता संलग्न । वैसे शब्दमें हैं कान । जिसको सर्वत्र ॥ ८१ ॥ इसीलिये हम जिसे । सभी सुनता है वैसे । कहते हैं सदा जिसे । विश्व-व्यापक ॥ ८२ ॥ वैसे तो सुन महामती । विश्वतः चक्षु आदि श्रुति । दिखाती है उसकी व्याप्ति । मूर्तिरूपसे ॥ ८३ ॥ इसीलिये नेत्र-पाद-हस्त । सभी भाषा है व्यर्थ । तथा शून्य भी अयुक्त पार्थ । 'वर्णनमें यहां ॥ ८४ ॥ कल्लोल निगलता कल्लोल । यही देखते हम सकल । ग्रासता ग्राससे जो सलिल । भिन्न है क्या ॥ ८५ ॥ वैसे सत्य ही जो एक । जो है व्याप्त औ' व्यापक । किंतु भाषा-हेतु देख । होता है भेद ॥ ८६ ॥ होता है जब शून्य दिखाना । पडता है बिंदु ही लिखना । वैसे जब अद्वैत कहना । द्वैतकी भाषामें ॥ ८७ ॥ ५०३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
नहीं तो सुन पार्थ । गुरु-शिष्य सत्पथ । टूट जाता सर्वथा । शब्द ही रुकेगा ॥ ८८ ॥ इसी कारणसे श्रुति । द्वैत भावसे करती । स्पष्ट अद्वैतकी स्थिति । परंपरासे ॥ ८९ ॥ सुन तू वही अब धनुर्धर । यहां जो नेत्र-गोचर आकार । वह सब ज्ञेय इस प्रकार । विश्व-व्यापक है ॥ ८९० ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १४ ॥ ब्रह्मदर्शनकी कृतार्थता— अर्जुन वह व्याप्त है ऐसे । अवकाशको आकाश जैसे । वस्त्र रूपसे हैं तंतु जैसे । होते हैं व्याप्त ॥ ९१ ॥ उदकमें जैसे रसत्व । दीपमें जैसे प्रकाशत्व । वैसे व्याप्त है वह तत्व । सदा सर्वत्र ॥ ९२ ॥ कर्पूरत्वसे कर्पूरमें जैसे सौरभ । सौरभ भरा रहता है वैसे । कर्म-रूपसे शरीरमें वैसे । बसता शरीर ॥ ९३ ॥ अथवा जैसे है अर्जुन । स्वर्णमें व्यापता है सुवर्ण । वैसे ही सर्वांग-संपूर्ण । बसता है वह ॥ ९४ ॥ कण रूपमें रहता सुवर्ण । कहते तब सुवर्णका कण । टूटता है कण-रूप सुवर्ण । स्वर्ण कहते तब ॥ ९५ ॥ प्रवाह जब टेढा बनता । पानी है तब सीधा रहता । आगसे लोहा लाल हो जाता । न होता वह अग्नि ॥ ९६ गोल होता जब घटाकार । नभ होता तब गोलाकार । होता है जब घर चौकाकार । नभ भी वैसे ही ॥ ९७ ॥ ———————————————————————————————— वह जो इंद्रियातीत उनके कार्य भासते । अ-स्पर्शसे धरे सारे अगुण गुण भोगके ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५०४
आकाशका नहीं होता आकार । दीखता जैसे वह सर्वाकार । अकाशपे नहीं होते विकार । वैसी वह वस्तु ॥ ९८ ॥ मन मुख्य इंद्रियोंसे । तथा सन्त्वादि गुणसे । आकार लेता है वैसे । दीखता यहां ॥ ९९ ॥ जैसे मीठेकी जो मिठास । न होती आकारमें खास । नहीं होता वह विशेष । गुणोंद्रियोंमें ॥ १०० ॥ अजी ! है दूधकी स्थितिमें । घृत होता उसी रूपमें । तथा दूधके अभावमें । घृत ही घृत ॥ १ ॥ यहां है वह विकारसे । विकृत नहीं होता वैसे । गहना आकार नामसे । नहीं तो सोना सोनाही ॥ २ ॥ यहां यदि स्पष्ट रूपसे । कहना हो सरलतासे । वह है गुण-इंद्रियोंसे । भिन्न तत्व ॥ ३ ॥ नभ-रूपका संबंध । जाति क्रिया आदि भेद । यह आकार प्रवाद । तत्वका नहीं ॥ ४ ॥ अजी ! वह कोई भी गुण नहीं । गुणसे उसका संबंध नहीं । किंतु गुणोंको उसके तईं । होता भास ॥ ५ ॥ यहां इसी कारणसे । मति संभ्रम होनेसे । उसमें विकार ऐसे । देखते हैं ॥ ६ ॥ उन विकारोंका धारण । जैसे बादलोंको गगन । या है प्रतिबिंब दर्पण । करते वैसे ॥ ७ ॥ अथवा सूर्य प्रति मंडल । धरता है पृथ्वीपे सलिल । या रश्मि-करमें मृगजल । धरता वैसे ॥ ८ ॥ वैसे है संबंधके बिन । सबको धरता निर्गुण । किंतु वह है व्यर्थ जान । भ्रांत-दृष्टि ॥ ९ ॥ इस भांति है निर्गुण । भोगता है सब गुण । रंकका राज धारण । स्वप्नमें जैसे ॥ ९१० ॥ (64) ५०५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इसीलिये गुणका संग । अथवा होना गुण-भोग । वह है निर्गुणमें त्याग । नहीं होता ॥ ११ ॥ बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥ चराचर भूतोंमें होता । विविध अग्नि पांडुसुत । किंतु होती जैसी उष्णता । अभेद रूपसे ॥ १२ ॥ वैसे ही अविनाश भावसे । रहता पूर्ण सूक्ष्म रूपसे । व्याप्त होकर जान उसे । यहां तू ज्ञेय ॥ १३ ॥ एक जो बाहर अंदर । वही एक पास औ' दूर । उस एकसे धनुर्धर । नहीं अन्य ॥ १४ ॥ अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥ क्षीर-सागरमें जैसा । माधुर्य होता एक-सा । तटमें मध्यमें वैसा । पूर्ण है जो ॥ १५ ॥ स्वेदज अंडजादिक । भूतोंमें व्याप्त जो एक । न होता उसमें देख । कभी न्यून ॥ १६ ॥ जिस प्रकार अनेक घटोंमें । प्रतिबिंब पडते सहस्रोंमें । किंतु भिन्नता नहीं चंद्रिकामें । वैसे ही पार्थ ॥ १७ ॥ या नाना लवण-कण राशिमें । क्षारता एक-सी होती सबमें । अथवा अनेक इक्षु-दंडमें । मिठास एक-सी ॥ १८ ॥ एक है जो अंतर्बाह्य जो है एक चराचर । जो है दूर तथा पास सूक्ष्मत्वसे अगम्य जो ॥ १५ ॥ अभेद भूत-मात्रोंमें रहा है जो विभक्त-सा । जन्म दे पालता भूत लीलता अंतमें स्वयं ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी ५०६
वैसे अनेक भूत-जात । उस एकसे ही व्याप्त । विश्व-कार्यका वही पार्थ । कारण एक ॥ १९ ॥ इसीलिये सब भूताकार । जिसका एक-मात्र आधार । जैसे तरंगोंका है सागर । आधार एक ॥ ९२० ॥ बाल्यादि स्थितियोंमें जैसे । शरीर है एक ही वैसे । सृष्टि-स्थिति-लयमें वैसे । अखंड है वह ॥ २१ ॥ सायं प्रातः पाध्यान्ह । चलता दिनमान । किंतु जैसे गगन । रहे एक-सा ॥ २२ ॥ सृष्टि-वेलामें प्रियोत्तम । कहते हैं जिसको ब्रह्म । व्याप्तिमें है जो विष्णु नाम । पडा उसको ही ॥ २३ ॥ मिटता है जब आकार । रुद्र तब प्रलयंकर । रहता तब शून्याकार । मिटते गुणत्रय ॥ २४ ॥ निगलकर नभका शून्य । मिटाकर जो गुणको अन्य । रहता है शून्य महाशून्य । श्रुति-वचन ऐसा ॥ २५ ॥ ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १७ ॥ अग्निका जो दीपन । चंद्रका जो जीवन । सूर्यके हैं नयन । देखते जिससे ॥ २६ ॥ सदैव जिसका उजियाला । प्रकाशता तारागण-माला । जिससे महा-तेज है खिला । सुखसे सर्वत्र ॥ २७ ॥ जो है आदिका आदि । तथा वृद्धिकी वृद्धि । बुद्धिकी भी है बुद्धि । जीवका जीव ॥ २८ ॥ कहाता तेजका तेज तथा तम तमांधका । ज्ञानका ज्ञान जो ज्ञेय सबका हृदयस्थ है ॥ १७ ॥ ५०७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
मनका है जो मन । नेत्रका है नयन । कानका है जो कान । वाचाकी वाचा ॥ २९ ॥ प्राणका है जो प्राण । गतिके है चरण । क्रियाका कर्तापन । जिससे है ॥ ९३० ॥ आकारता जिससे आकार । विस्तारता उससे विस्तार । संहारता उससे संहार । धनंजय यहां ॥ ३१ ॥ जो है मेदिनीकी मेदिनी । जो पानीको पीकर पानी । तेजका प्रकाश-दायिनी । महा-तेजशक्ति ॥ ३२ ॥ वायुका है वह श्वासोच्छ्वास । तथा गगनका अवकाश । इन सबका है जो आभास । आभासता जिससे ॥ ३३ ॥ अथवा है यह अर्जुन । सबमें है सर्वस्व पूर्ण । वहां नहीं होता दर्शन । द्वैतका कभी ॥ ३४ ॥ होते ही इसका दर्शन । मिटता दृश्य-द्रष्टा पूर्ण । हो जाता है जब मिलन । समरस भावसे ॥ ३५ ॥ फिर होता वहीं ज्ञान । ज्ञाता ज्ञेयका दर्शन । औ' ज्ञानसे प्राप्ति-स्थान । वह भी यही ॥ ३६ ॥ जैसा समाप्त होते लेख । संख्या सब हो जाती एक । वैसे साध्य-साधनादिक । आता एकत्वमें ॥ ३७ ॥ जिस स्थानमें अर्जुन देख । नहीं होता द्वैतका उल्लेख । वही होता हृदयमें एक । भूतमात्रके ॥ ३८ ॥ इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥ कहा है अल्पमें क्षेत्र वैसे ही ज्ञान ज्ञेय भी । जानके भक्त है मेरा पाता सायुज्य है मम ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ५०८
आत्माके एकत्वका विवेचन-आत्मानात्म विचार- इस प्रकारसे पार्थ । पहिलेसे ही निश्चित । स्पष्ट किया क्या है खेत । विवेचनसे ॥ ३९ ॥ वैसे ही क्षेत्र-दर्शन । करने दिये नयन । कहते हैं जिसे ज्ञान । कहा वह भी ॥ ४० ॥ वैसे ही अज्ञान लक्षण । किये सविस्तर वर्णन । जिसे सुनकर अर्जुन । थका होगा तू ॥ ४१ ॥ तथा स्पष्टतासे पार्थ । कहा देकर दृष्टांत । ज्ञेय-स्वरूप निश्चित । समझाके ॥ ४२ ॥ यह जो विवेचन संपूर्ण । करता है हृदय ग्रहण । मत्सिद्धि भावना प्राण । करता सहज ॥ ४३ ॥ तब देहादिका परिग्रह । होता है संन्यास निराग्रह । तथा प्राण होता निरीह । सेवक मेरा ॥ ४४ ॥ तब वे मैं ही हूं अर्जुन । अंतिम आसरा है जान । कर मुझे चित्त अर्पण । होते मद्रूप ॥ ४५ ॥ मद्रूप होनेका पथ । .रचाया सुन तू पार्थ । सुलभ और निश्चित । हमने यह ॥ ४६ ॥ चढनेमें जैसे सीढी रचते । अथवा ऊपर मंच बांधते । तथा अपनी नांव भी रखते । तैरने पूरमें ॥ ४७ ॥ सब कुछ है यदि यहां आत्मा । ऐसा कहता तो मैं वीरोत्तम । ग्रहण न करना मनो-धर्म । यह बात मेरी ॥ ४८ ॥ इसीलिये था जो एकाकार । कर बताये चार प्रकार । देखके तेरी पांडुकुमार । मंद बुद्धि ॥ ४९ ॥ शिशुको जब खिलाते । ग्रास बीस कर देते । वैसे ही चार कहे ये । हमने एकके ॥ ५० ॥ ५०९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
एक क्षेत्र औ' एक ज्ञान । एक ज्ञेय एक अज्ञान । भाग किये ये तेरी जान । ग्रहण-शक्ति ॥ ५१ ॥ किंतु इस भांतिसे भी पार्थ । मंतव्य समझमें न आता । तब यह दूसरी व्यवस्था । कहता तुझे ॥ ५२ ॥ चार भाग यहां नहीं करूंगा । एक ही तत्व नहीं कहूंगा । आत्मानात्म विचार कहूंगा । अब तुझसे ॥ ५३ ॥ किंतु तुझे इतना करना । ध्यान पूर्वक बात सुनना । श्रवणोंका है नाम रखना । अपना ही ॥ ५४ ॥ सुनकर कृष्ण वचन पार्थ । प्रसन्न-मन हुवा रोमांचित । कृष्ण मानता हुई है अंकित । बात इनपे ॥ ५५ ॥ इससे हुवा भावावेग । समेट कहता श्रीरंग । प्रकृति-पुरुष विभाभ । कहता हूं सुन ॥ ५६ प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १९ ॥ कहते जिसे योगी-जन । सांख्य-योग इसे अर्जुन । जिसको कहनेमें मान । हुवा मैं कपिल ॥ ५७ ॥ सुन तू अब निर्दोष । प्रकृति-पुरुष विवेक । कहता है आदि पुरुष । अर्जुनसे वहां ॥ ५८ ॥ प्रकृति प्रेरित कर्मका भोक्ता— पुरुष अनादि है साथी । उसकी रही है प्रकृति । जैसे है दिवस औ' राति । दोनों अनादि ॥ ५९ ॥ रूप नहीं होता व्यर्थ । छाया होती उसके साथ । दाने सह भूसा भी पार्थ । बढता जैसे ॥ १६० ॥ प्रकृति-पुरुषकी है जोडी जान अनादि तू । होते प्रकृतिके द्वारा विकार गुण है सब ॥ १९ ॥ ज्ञानेश्वरी ५१०
दोनो रहते हैं वैसे साथ । प्रकृति-पुरुष होते व्यक्त । परस्पर चिपके हैं पार्थ । अनादि सिद्ध ॥ ६१ ॥ जिसका नाम क्षेत्र । कहा है एक-मात्र । जानता है सर्वत्र । प्रकृति उसे ॥ ६२ ॥ तथा क्षेत्रज्ञ है ऐसे । कहा है जिसको उसे । मानता पुरुष उसे । यह है स्पष्ट ॥ ६३ ॥ इनके हैं ये नाम भिन्न । किंतु तत्व एक अर्जुन । न भूलना यह लक्षण । यहां कभी ॥ ६४ ॥ रही है यहां जो सत्ता । वही पुरुष है पार्थ । प्रकृति नाम समस्त । क्रिया मात्रका ॥ ६५ ॥ बुध्दि-इंद्रिय-अतःकरण । इत्यादि है विकार भरण । तथा रहे हैं वे तीनों गुण । सत्व रजादिक ॥ ६६ ॥ इन सबका मिलन । प्रकृतिसे हुवा जान । इसीसे होते उमझ । सभी कर्म ॥ ६७ ॥ कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥ वहां इच्छा बुध्दि सहित । अहंकार सह घाटित । उसे चस्का लगाते पार्थ । करणोंका ॥ ६८ ॥ यही कारण करने संपन्न । जिन उपयोंका सूत्र चालन । उसको कहते सुन अर्जुन । कार्य है यह ॥ ६९ ॥ तथा इच्छा मदके द्वारा । प्रकृतिने मन उभारा । औ' इंद्रियोंका व्यवहार । वह है कर्तृत्व ॥ १७० ॥
कहा प्रकृतिके पास कर्तृत्व देह-इंद्रिका । तथा पुरुषके पास भोक्तृत्व सुख दुःखका ॥ २१ ॥ ५११ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
सभी यह तीनों जान । कार्य कर्तृत्व कारण । प्रकृति मूल श्रीकृष्ण । कहता यहां ॥ ७१ ॥ ऐसे तीनोंके ही समन्वयसे । प्रकृति होती है कर्म-रूपसे । फिर जो गुण बढ़ाता है जैसे । लेती है वह रूप ॥ ७२ ॥ सत्व-गुणसे जो बनता । वह सत्कर्म कहलाता । रजसे जो है निपजता । वह है मध्यम ॥ ७३ ॥ जिसका आधार है तम । ऐसे होते हैं सब काम । कहलाते हैं वे अधम । जान तू यहां ॥ ७४ ॥ ऐसे होते हैं प्रकृतिसे । भले बुरे कर्म जो जैसे । उत्पन्न होते हैं उनसे । सुख दुःख ॥ ७५ ॥ असत्कर्मसं दुःख उत्पन्न । सत्कर्मसे है सुख अर्जुन । उन दोनोंको कहते जान । भोग पुरुषका ॥ ७६ ॥ सुख दुःख सब जब तक । सच मानते हैं तब तक । प्रकृति कर्मरत है देख । औ' पुरुष भोगता ॥ ७७ ॥ प्रकृति पुरुषका संसार । अति असंगत धनुर्धर । लाती है भार्या जो कमाकर । खाता है भर्त्ता ॥ ७८ ॥ तथा भर्त्ता भार्या परस्पर । नहीं करते संग संसार । और सुनो यह चमत्कार । प्रकृति जनती जग ॥ ७९ ॥ पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् । कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥ प्रकृतिके गुणोंसे होने वाला भास— यह भर्त्ता है निराकार । निष्क्रिय निर्गुण है और । जरा-जीर्ण है धनुर्धर । वृद्धातिवृध्द ॥ ९८० ॥ बंधा है प्रकृतीसे जो उसके गुण भोगता । शुभाशुभ जन्म पाता प्रकृति-संगसे यह ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५१२
वह नाम मात्रका है पुरुष । नहीं नर नारी जो नपुंसक । अथवा मानो नहीं जाने एक । क्या है निश्चित ॥ ८१ ॥ वह है अचक्षु अश्रवण । तथा जो अ-हस्त अ-चरण । जिसका नहीं रूप औ' वर्ण । नाम भी नहीं ॥ ८२ ॥ जहां कुछ भी नहीं है पार्थ । देखती वहां प्रकृति भर्ता । इससे उसे भोगना होता । सुख दुःख ॥ ८३ ॥ वह है जो अकर्ता । उदास औ' अभोक्ता । किंतु है पतिव्रता । भोगती है ॥ ८४ ॥ उसके गुण-रूपका मेल । कर दिखाता है बड़ा खेल । दिखाती झांकी वह केवल । धनुर्धर ॥ ८५ ॥ इस प्रवृत्तिको यहां अब । गुण-मयी कहते हैं सब । अथवा वह गुणोंकी सब । मूर्ति ही है ॥ ८६ ॥ प्रति-पलमें यह नित्य-नूतन । दिखाती है गुणोंका रंग अर्जुन । जिससे जड़ भी उन्मादित मन । होते उन्मत्त ॥ ८७ ॥ यही है नामको प्रसिद्ध । करती है स्नेहसे स्निग्ध । होती हैं इंद्रियां प्रबुध्द । इससे ही ॥ ८८ ॥ अजी ! कहते हैं मन नपुंसक । किंतु भोगती वह तीनो लोक । ऐसे ऐसे हैं इसके अलौकिक । करतूत सारे ॥ ८९ ॥ भ्रमका यह महा-द्वीप । व्याप्तिका है सुंदर रूप । विकार इसके अमाप । सभी प्रकारके ॥ ९९० ॥ यह है कामकी मांडवी । मोह-वनकी जो माधवी । इसको कहते हैं “देवी- । माया” है यह ॥ ९१ ॥ यह है वाङ्मयका विस्तार । नाम-रूप करती साकार । प्रपंच जाल जो निरंतर । फैलती अभंग ॥ ९२ ॥ कालकी है यही जाया । विद्याको इसने किया । इच्छा ज्ञान तथा क्रिया । इसीसे जान ॥ ९३ ॥ ५१३ (65) क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
यह है नादका टंकसाळ । सकल चमत्कारका स्थल । अथवा करती सब खेल । अखिल विश्वका ॥ ९४ ॥ उत्पत्ति प्रलय जो पार्थ । इसके सब सायं-प्रात । यह सब अति अद्भुत । मोहका सारा ॥ ९५ ॥ अद्वयकी दूसरी मूर्ति । मानो निःसंगकी साथी । शून्यके घरमें वस्ति । धनंजय ॥ ९६ ॥ उसका है पांडुकुमार । सौभाग्य-व्याप्तिका विस्तार । अनावृत पुरुष पर । डालती आवरण ॥ ९७ ॥ सदा है वह निर्विकार । बनती उसके विकार । वहां यह सब प्रकार । बनती आप ॥ ९८ ॥ उस स्वयंभूकी है उत्पत्ति । उस अमूर्तकी जो है मूर्ति । तथा बनती स्थिति-प्रकृति । स्वयं आप ॥ ९९ ॥ उस अनार्तकी यह आर्त । तथा पूर्णत्वकी यह तृप्त । उस अकुलकी जात-गोत । बनती यही ॥ १००० ॥ अवर्णनीयका वर्णन । उस अपारका प्रमाण । तथा उस अमनस्कका मन । बुद्धि भी बनती ॥ १ ॥ उस निराकारका आकार । तथा निष्व्यापारका व्यापार । निरहंकारका अहंकार । बन बैठती है ॥ २ ॥ उस अनामका नाम । तथा अजन्मका जन्म । स्वयं होती यह कर्म- । क्रिया उसकी ॥ ३ ॥ उस निर्गुणके गुण । अ-चरणके चरण । अ-श्रवणके श्रवण । अ-चक्षुके चक्षु ॥ ४ ॥ उस भावातीतका है भाव । निरवयवके अवयव । अथवा बनती है सर्व । उस पुरुषका ॥ ५ ॥ इस भांति यह प्रकृति । बढाकर अपनी व्याप्ति । विकृति जालमें फंसाती । अविकारीको ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ५१४
यहां जो पुरुषत्व होता । प्रकृति कारण बनता । अमावास्यमें रहता । चन्द्रमा जैसे ॥ ७ ॥ जैसे अति-स्वच्छ सुवर्ण । मिलकर जस्तके कण । बनता जाता है जो हीन । उसी भांति ॥ ८ ॥ या बनता जैसे सज्जन । पिशाच-संगसे है हीन । बादल व्याप्त हो गगन । दुर्दिन करता ॥ ९ ॥ या पय होता पशुके स्तनमें । अथवा अग्नि होता लकडीमें । तथा लपेट लिया है वस्त्रमें । नंदादीप ॥ १०१० ॥ जब होता राजा पराधीन । तथा सिंह रोगके आधीन । वैसे पुरुषत्व तेज-हीन । होता प्रकृतिमें ॥ ११ ॥ जगता हुवा मनुष्य जैसे । यकायक निद्रित होनेसे । स्वप्नमें दुःख भोगता वैसे । यहां वह ॥ १२ ॥ वैसे प्रकृतिके आधीन । भोगता है पुरुष गुण । जैसे विरक्त स्त्री-आधीन । उखडता है ॥ १३ ॥ वैसे ही अज नित्यका जो होता । जन्म-मृत्यु सहना पडता । प्रकृति-गुण संगसे होता । सभी यह ॥ १४ ॥ किंतु यह जैसे पांडुसुत । तप्त लोहपे होता आघात । तब अग्निको होते हैं घान । मानते वैसे ॥ १५ ॥ या आंदोलनसे उदक । प्रतिभा होती है अनेक । उसे कहे नानात्व लोक । चंद्रका जैसे ॥ १६ ॥ या पास होनेसे दर्पण । एकके दो दीखते आनन । या कुंकुमसे रक्त-वर्ण । आता स्फटिकमें ॥ १७ ॥ गुण संगसे ऐसा होता । अजन्मा है जनम लेता । ऐसा यह आभास होता । अन्यथा नहीं ॥ १८ ॥ अधमोत्तम योनि वैसे । मानते हैं इसको ऐसे । संन्यासी स्वप्नमें ही जैसे । बनता अंत्यज ॥ १९ ॥ ५१५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इसलिये केवल पुरुष । नहीं भोगता है कुछ देख । यहां गुण-संग ही अशेष । लगता मूलमें ॥ १०२० ॥ उपद्रष्टानुमंता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२ ॥ अजी ! यह खड़ा है प्रकृतिमें । आधार-स्तंभसा लता बीचमें । अंतर जो है धरणी नभमें । वही इनमें है ॥ २१ ॥ तीरमें प्रकृति सरिताके । खडा मेरु-सा बन करके । प्रवाहमें स्थिर है इसके । प्रतिबिंब मात्र ॥ २२ ॥ प्रकृति होती है प्रवाहित । स्थिर रहता यह सतत । तभी इसमें होता शासित । ब्रह्मांड सारा ॥ २३ ॥ प्रकृति है इससे ही जीवित । इसकी सत्तासे ही वस्तुजात । प्रसवती तभी है यह कांत । होता प्रकृतिका ॥ २४ ॥ अनंत-कालसे अर्जुन । सृष्टि होती यह उत्पन्न । तथा होती इसीमें लीन । कल्पांतमें ॥ २५ ॥ तभी है यह प्रकृतिका ईश । ब्रह्मांडका सूत्रधार विशेष । इसे तोलता रहता अशेष । पांडुकुमार ॥ २६ ॥ अजी ! सुन इस शरीरमें । परमात्म है ऐसे बोलनेमें । आता है जो इसीके विषयमें । जान ले तू ॥ २७ ॥ प्रकृतिके उस पार एक । कोई है कहते सभी देख । वह यही परम पूरुष । जान तत्वतः ॥ २८ ॥ य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥ सर्व-साक्षी अनु-ज्ञाता भर्ता भोक्ता महेश्वर । कहते परमात्मा है देहमें पर- पूरुष ॥ २२ ॥ ऐसा पुरुषका रूप प्रकृतिका गुणात्मक जानता जो यह ऐसा न कभी जन्मता फिर ॥ २३ ॥ गी ५१६ ज्ञानेश्व
जिसने यह जान लिया वह मुक्त है— पुरुषका जो शुद्ध-रूप । संपूर्ण जानता है आप । प्रकृतिके क्रिया कलाप । गुण हैं सारे ॥ २९ ॥ यह रूप तथा यह छाया । यह जल तथा यह माया । करना निर्णय धनंजय । ऐसा सभी ॥ १०३० ॥ इस प्रकारसे अर्जुन । प्रकृति पुरुष विवेचन । स्पष्ट करता जिसका मन । सदा सर्वत्र ॥ ३१ ॥ शरीरसे रखके मेल । करता है कर्म सकल । रहता नभसा निर्मल । असंग हो ॥ ३२ ॥ देहमें वह ऐसा रहता । देह-मोहसे नहीं भ्रमता । देह-पातपे नहीं जन्मता । फिरसे वह ॥ ३३ ॥ होता है जब यह एक । प्रकृति पुरुष विवेक । तब करता अलौकिक । महदुपकार ॥ ३४ ॥ यह विवेक-भानुके समान । उजलायेगा अंतःकरण । उसके उपाय अनेक सुन । कहता हूं मैं ॥ ३५ ॥ ध्यानेनात्मनि पश्यंति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥ आत्मानात्म विवेक-साधनका उपाय— सुन तू अर्जुन कई एक । विचार-रूपी अग्निमें रख । हीन कसका जो सुवर्णक । पुट देकर ॥ ३६ ॥ जलाते सभी सैंतीस । अनात्म-भेद सर्वस । चुनते हैं शुद्ध-शेष । आत्म-तत्व ॥ ३७ ॥ अपने ही हियमें उसे । देखते अपनी दृष्टिसे । आप ही सदा अपनेसें । पांडुकुमार ॥ ३८ ॥ ध्यानसे देखता कोई आत्माको हियमें स्वयं । सांख्य-योग तथा कोई पाते हैं कर्म-योगसे ॥ २४ ॥ ५१७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
और कुछ दैव-योगसे । चित्त देते सांख्य-योगसे । और कुछ कर्माचरणसे । देखते वह तत्व ॥ ३९ ॥ अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते । तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥ ऐसे सुन पांडुकुमार । तर जाते भव-भंवर । पाके कुछ अन्य प्रकार । भली भांतिसे ॥ १०४० ॥ तब वह ऐसा करते । अभिमान सभी तजते । गुरुपे विश्वास रखते । पूर्ण-रूपसे ॥ ४१ ॥ हित अहित सब देखते । हानि देख दयासे भरते । जानकर दुःख भी हरते । तथा देते हैं सुख ॥ ४२ ॥ उनके मुखसे जो शब्द निकलते । सब वे अति-आदरसे सुनते । तथा तन मनसे वैसे ही बनते । पांडुकुमार ॥ ४३ ॥ सुननेके लिये ही केवल । करते हैं कर्तव्य सकल । शब्द पर निष्ठासे अचल । होते निछावर ॥ ४४ ॥ सुन तू यह धनंजय । मरणार्णवसे निर्भय । निकलते हो अमृतमय । भली भांति ॥ ४५ ॥ जाननेके हैं अनेक । उपाय यहां हैं देख । उससे जानना एकं । परम तत्व ॥ ४६ ॥ कोई भाग्यवान ही विश्वकी विविधतामें एकता देख सकता है— अब हुआ यह बहुत । किंतु सर्वार्थका मथित । सिद्धांत तत्व-नवनीत । देता हूं तुझे ॥ ४७ ॥ स्वयं न जानके कोई बड़ोंसे सुनके सब । तरते मृत्युको वे भी श्रद्धासे कर वर्तन ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ५१८