भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वह नाम मात्रका है पुरुष । नहीं नर नारी जो नपुंसक । अथवा मानो नहीं जाने एक । क्या है निश्चित ॥ ८१ ॥ वह है अचक्षु अश्रवण । तथा जो अ-हस्त अ-चरण । जिसका नहीं रूप औ' वर्ण । नाम भी नहीं ॥ ८२ ॥ जहां कुछ भी नहीं है पार्थ । देखती वहां प्रकृति भर्ता । इससे उसे भोगना होता । सुख दुःख ॥ ८३ ॥ वह है जो अकर्ता । उदास औ' अभोक्ता । किंतु है पतिव्रता । भोगती है ॥ ८४ ॥ उसके गुण-रूपका मेल । कर दिखाता है बड़ा खेल । दिखाती झांकी वह केवल । धनुर्धर ॥ ८५ ॥ इस प्रवृत्तिको यहां अब । गुण-मयी कहते हैं सब । अथवा वह गुणोंकी सब । मूर्ति ही है ॥ ८६ ॥ प्रति-पलमें यह नित्य-नूतन । दिखाती है गुणोंका रंग अर्जुन । जिससे जड़ भी उन्मादित मन । होते उन्मत्त ॥ ८७ ॥ यही है नामको प्रसिद्ध । करती है स्नेहसे स्निग्ध । होती हैं इंद्रियां प्रबुध्द । इससे ही ॥ ८८ ॥ अजी ! कहते हैं मन नपुंसक । किंतु भोगती वह तीनो लोक । ऐसे ऐसे हैं इसके अलौकिक । करतूत सारे ॥ ८९ ॥ भ्रमका यह महा-द्वीप । व्याप्तिका है सुंदर रूप । विकार इसके अमाप । सभी प्रकारके ॥ ९९० ॥ यह है कामकी मांडवी । मोह-वनकी जो माधवी । इसको कहते हैं “देवी- । माया” है यह ॥ ९१ ॥ यह है वाङ्मयका विस्तार । नाम-रूप करती साकार । प्रपंच जाल जो निरंतर । फैलती अभंग ॥ ९२ ॥ कालकी है यही जाया । विद्याको इसने किया । इच्छा ज्ञान तथा क्रिया । इसीसे जान ॥ ९३ ॥ ५१३ (65) क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग