भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 586

यह है नादका टंकसाळ । सकल चमत्कारका स्थल । अथवा करती सब खेल । अखिल विश्वका ॥ ९४ ॥ उत्पत्ति प्रलय जो पार्थ । इसके सब सायं-प्रात । यह सब अति अद्भुत । मोहका सारा ॥ ९५ ॥ अद्वयकी दूसरी मूर्ति । मानो निःसंगकी साथी । शून्यके घरमें वस्ति । धनंजय ॥ ९६ ॥ उसका है पांडुकुमार । सौभाग्य-व्याप्तिका विस्तार । अनावृत पुरुष पर । डालती आवरण ॥ ९७ ॥ सदा है वह निर्विकार । बनती उसके विकार । वहां यह सब प्रकार । बनती आप ॥ ९८ ॥ उस स्वयंभूकी है उत्पत्ति । उस अमूर्तकी जो है मूर्ति । तथा बनती स्थिति-प्रकृति । स्वयं आप ॥ ९९ ॥ उस अनार्तकी यह आर्त । तथा पूर्णत्वकी यह तृप्त । उस अकुलकी जात-गोत । बनती यही ॥ १००० ॥ अवर्णनीयका वर्णन । उस अपारका प्रमाण । तथा उस अमनस्कका मन । बुद्धि भी बनती ॥ १ ॥ उस निराकारका आकार । तथा निष्व्यापारका व्यापार । निरहंकारका अहंकार । बन बैठती है ॥ २ ॥ उस अनामका नाम । तथा अजन्मका जन्म । स्वयं होती यह कर्म- । क्रिया उसकी ॥ ३ ॥ उस निर्गुणके गुण । अ-चरणके चरण । अ-श्रवणके श्रवण । अ-चक्षुके चक्षु ॥ ४ ॥ उस भावातीतका है भाव । निरवयवके अवयव । अथवा बनती है सर्व । उस पुरुषका ॥ ५ ॥ इस भांति यह प्रकृति । बढाकर अपनी व्याप्ति । विकृति जालमें फंसाती । अविकारीको ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ५१४