भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 587

यहां जो पुरुषत्व होता । प्रकृति कारण बनता । अमावास्यमें रहता । चन्द्रमा जैसे ॥ ७ ॥ जैसे अति-स्वच्छ सुवर्ण । मिलकर जस्तके कण । बनता जाता है जो हीन । उसी भांति ॥ ८ ॥ या बनता जैसे सज्जन । पिशाच-संगसे है हीन । बादल व्याप्त हो गगन । दुर्दिन करता ॥ ९ ॥ या पय होता पशुके स्तनमें । अथवा अग्नि होता लकडीमें । तथा लपेट लिया है वस्त्रमें । नंदादीप ॥ १०१० ॥ जब होता राजा पराधीन । तथा सिंह रोगके आधीन । वैसे पुरुषत्व तेज-हीन । होता प्रकृतिमें ॥ ११ ॥ जगता हुवा मनुष्य जैसे । यकायक निद्रित होनेसे । स्वप्नमें दुःख भोगता वैसे । यहां वह ॥ १२ ॥ वैसे प्रकृतिके आधीन । भोगता है पुरुष गुण । जैसे विरक्त स्त्री-आधीन । उखडता है ॥ १३ ॥ वैसे ही अज नित्यका जो होता । जन्म-मृत्यु सहना पडता । प्रकृति-गुण संगसे होता । सभी यह ॥ १४ ॥ किंतु यह जैसे पांडुसुत । तप्त लोहपे होता आघात । तब अग्निको होते हैं घान । मानते वैसे ॥ १५ ॥ या आंदोलनसे उदक । प्रतिभा होती है अनेक । उसे कहे नानात्व लोक । चंद्रका जैसे ॥ १६ ॥ या पास होनेसे दर्पण । एकके दो दीखते आनन । या कुंकुमसे रक्त-वर्ण । आता स्फटिकमें ॥ १७ ॥ गुण संगसे ऐसा होता । अजन्मा है जनम लेता । ऐसा यह आभास होता । अन्यथा नहीं ॥ १८ ॥ अधमोत्तम योनि वैसे । मानते हैं इसको ऐसे । संन्यासी स्वप्नमें ही जैसे । बनता अंत्यज ॥ १९ ॥ ५१५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग