भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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इसलिये केवल पुरुष । नहीं भोगता है कुछ देख । यहां गुण-संग ही अशेष । लगता मूलमें ॥ १०२० ॥ उपद्रष्टानुमंता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२ ॥ अजी ! यह खड़ा है प्रकृतिमें । आधार-स्तंभसा लता बीचमें । अंतर जो है धरणी नभमें । वही इनमें है ॥ २१ ॥ तीरमें प्रकृति सरिताके । खडा मेरु-सा बन करके । प्रवाहमें स्थिर है इसके । प्रतिबिंब मात्र ॥ २२ ॥ प्रकृति होती है प्रवाहित । स्थिर रहता यह सतत । तभी इसमें होता शासित । ब्रह्मांड सारा ॥ २३ ॥ प्रकृति है इससे ही जीवित । इसकी सत्तासे ही वस्तुजात । प्रसवती तभी है यह कांत । होता प्रकृतिका ॥ २४ ॥ अनंत-कालसे अर्जुन । सृष्टि होती यह उत्पन्न । तथा होती इसीमें लीन । कल्पांतमें ॥ २५ ॥ तभी है यह प्रकृतिका ईश । ब्रह्मांडका सूत्रधार विशेष । इसे तोलता रहता अशेष । पांडुकुमार ॥ २६ ॥ अजी ! सुन इस शरीरमें । परमात्म है ऐसे बोलनेमें । आता है जो इसीके विषयमें । जान ले तू ॥ २७ ॥ प्रकृतिके उस पार एक । कोई है कहते सभी देख । वह यही परम पूरुष । जान तत्वतः ॥ २८ ॥ य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥ सर्व-साक्षी अनु-ज्ञाता भर्ता भोक्ता महेश्वर । कहते परमात्मा है देहमें पर- पूरुष ॥ २२ ॥ ऐसा पुरुषका रूप प्रकृतिका गुणात्मक जानता जो यह ऐसा न कभी जन्मता फिर ॥ २३ ॥ गी ५१६ ज्ञानेश्व