ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिसने यह जान लिया वह मुक्त है— पुरुषका जो शुद्ध-रूप । संपूर्ण जानता है आप । प्रकृतिके क्रिया कलाप । गुण हैं सारे ॥ २९ ॥ यह रूप तथा यह छाया । यह जल तथा यह माया । करना निर्णय धनंजय । ऐसा सभी ॥ १०३० ॥ इस प्रकारसे अर्जुन । प्रकृति पुरुष विवेचन । स्पष्ट करता जिसका मन । सदा सर्वत्र ॥ ३१ ॥ शरीरसे रखके मेल । करता है कर्म सकल । रहता नभसा निर्मल । असंग हो ॥ ३२ ॥ देहमें वह ऐसा रहता । देह-मोहसे नहीं भ्रमता । देह-पातपे नहीं जन्मता । फिरसे वह ॥ ३३ ॥ होता है जब यह एक । प्रकृति पुरुष विवेक । तब करता अलौकिक । महदुपकार ॥ ३४ ॥ यह विवेक-भानुके समान । उजलायेगा अंतःकरण । उसके उपाय अनेक सुन । कहता हूं मैं ॥ ३५ ॥ ध्यानेनात्मनि पश्यंति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥ आत्मानात्म विवेक-साधनका उपाय— सुन तू अर्जुन कई एक । विचार-रूपी अग्निमें रख । हीन कसका जो सुवर्णक । पुट देकर ॥ ३६ ॥ जलाते सभी सैंतीस । अनात्म-भेद सर्वस । चुनते हैं शुद्ध-शेष । आत्म-तत्व ॥ ३७ ॥ अपने ही हियमें उसे । देखते अपनी दृष्टिसे । आप ही सदा अपनेसें । पांडुकुमार ॥ ३८ ॥ ध्यानसे देखता कोई आत्माको हियमें स्वयं । सांख्य-योग तथा कोई पाते हैं कर्म-योगसे ॥ २४ ॥ ५१७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग