भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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और कुछ दैव-योगसे । चित्त देते सांख्य-योगसे । और कुछ कर्माचरणसे । देखते वह तत्व ॥ ३९ ॥ अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते । तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥ ऐसे सुन पांडुकुमार । तर जाते भव-भंवर । पाके कुछ अन्य प्रकार । भली भांतिसे ॥ १०४० ॥ तब वह ऐसा करते । अभिमान सभी तजते । गुरुपे विश्वास रखते । पूर्ण-रूपसे ॥ ४१ ॥ हित अहित सब देखते । हानि देख दयासे भरते । जानकर दुःख भी हरते । तथा देते हैं सुख ॥ ४२ ॥ उनके मुखसे जो शब्द निकलते । सब वे अति-आदरसे सुनते । तथा तन मनसे वैसे ही बनते । पांडुकुमार ॥ ४३ ॥ सुननेके लिये ही केवल । करते हैं कर्तव्य सकल । शब्द पर निष्ठासे अचल । होते निछावर ॥ ४४ ॥ सुन तू यह धनंजय । मरणार्णवसे निर्भय । निकलते हो अमृतमय । भली भांति ॥ ४५ ॥ जाननेके हैं अनेक । उपाय यहां हैं देख । उससे जानना एकं । परम तत्व ॥ ४६ ॥ कोई भाग्यवान ही विश्वकी विविधतामें एकता देख सकता है— अब हुआ यह बहुत । किंतु सर्वार्थका मथित । सिद्धांत तत्व-नवनीत । देता हूं तुझे ॥ ४७ ॥ स्वयं न जानके कोई बड़ोंसे सुनके सब । तरते मृत्युको वे भी श्रद्धासे कर वर्तन ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ५१८