ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइससे होगा सहज । अनुभव तुझे आज । यह होने पर तुझ । न होगा सायास ॥ ४८ ॥ इसीलिये शुद्ध-प्रज्ञासे कर । सिद्धांतकी रचना सुंदर । पाखंडकी पूरी खंडना कर । कहता फलितार्थ ॥ ४९ ॥ यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥ क्षेत्रज्ञ क्या यह समझाया । अपना रूप तुझे दिखाया । तथा क्षेत्र भी सब समझाया । संपूर्ण रूपसे ॥ १०५० ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका यह मिलन । करता भूत-मात्रको उत्पन्न । जैसे सलिल अनिल मिलन । रचते तरंग ॥ ५१ ॥ अथवा जब दिनकरके किरण । करते ऊसर भूमिका आलिंगन । होता है मृगजल-पूर-सा दर्शन । धनंजय ॥ ५२ ॥ अथवा वर्षाकी धारासे । भीगी हुयी धरणीमेंसे । अंकुर नाना प्रकारसे । निकलते अनेक ॥ ५३ ॥ वैसे चराचर संपूर्ण । जीव-जगतका निर्माण । करता उभय मिलन । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ॥ ५४ ॥ इसीलिये हे अर्जुन । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञसे भिन्न । नहीं है कोई जान । साकार वस्तु ॥ ५५ ॥ समं सर्वेषुभूतेषु तिष्ठंतं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यंतं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥ विश्वमें उत्पन्न जो जो होते स्थावर जंगम । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ संयोग यही कारण जान तू ॥ २६ ॥ समान सब भूतोंमें रहा है परमेश्वर । अनाशी नाशवंतोंमें जो देखे वह देखता ॥ २७ ॥ ५१९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग