ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 592, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैसे पटत्व नही है तंतु । किंतु पटका आधार तंतु । यह प्रज्ञा-दृष्टिसे जान तू । ऐक्य भाव ॥ ५६ ॥
सब भूतोंका आधार । एक ही है तत्व-सार । दीखते भिन्न आकार । देखनेमें ॥ ५७ ॥
इनके नाम अनेक । व्यवहार भी अनेक । तथा रूप भी अनेक । दीखते हैं ॥ ५८ ॥
देख कर यह अर्जुन । करेगा द्वैत-भाव मन । मुक्त होना अवश्य जान । जन्म-मरणसे ॥ ५९ ॥
जैसे अनेक कारणसे । लगते नाना आकारसे । लतामें अगणित जैसे । फल कुमडेके ॥ १०६० ॥
अथवा बेरकी जो लकडी । सरल हो अथवा हो टेढी । वस्तु एक है खडी या पडी । वैसे वह तत्व ॥ ६१ ॥
जैसे अग्निकण अनेक । उसकी दाहकता एक । वैसे जीव-राशि अनेक । एक परतत्व ॥ ६२ ॥
वर्षाधार गगन भर । उसमें एक ही है नीर । वैसे हे नाना भूताकार । सबमें ईश एक ॥ ६३ ॥
भूतग्राम सब विषम । सबमें वस्तु एक सम । घर घरमें होता व्योम । एकसा जैसे ॥ ६४ ॥
नाश होने पर भूताभास । आत्मा होता एक अविनाश । जैसे अलंकार है विशेष । उसमें एक स्वर्ण ॥ ६५ ॥
जैसे जीव-धर्म हीन । तथा जीवसे अभिन्न । देखता जो सु-नयन । ज्ञानियोंमें ॥ ६६ ॥
ज्ञान-दृष्टिमें अर्जुन । होता है जो सु-नयन । वही बडा भाग्यवान । नहीं यह बढा ॥ ६७ ॥
ज्ञानेश्वरी ५२०