ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥ गुणेंद्रियोंकी जो धोकटी । देह-धातुओंकी त्रिपुटी । पंच मेलकी यह पटी । दारुण है सब ॥ ६८ ॥ पांच डंकोंका है यह वृश्चिक । अथवा पंचाग्नि ताप-दायक । अथवा मृगकी मांद है एक । मिली वन-राजको ॥ ६९ ॥ शरीरमें रहकर ऐसे । नित्य-भावकी तलवारसे । अनित्यताका उदर कैसे । नहीं फाडता ॥ १०७० ॥ ज्ञानीका गंतव्य, जहां मोक्ष भी विश्रांति लेता है— किंतु इस देहमें रहकर । न करता अपने प्रहार । तथा अवसानपे धनुर्धर । मिलता मुझमें ॥ ७१ ॥ अनेक जन्मोंको पार कर । योग-ज्ञानका सहारा लेकर । योगी जन डुबकी लगाकर । बैठते यहां ॥ ७२ ॥ आकारका जो पैल तीर । नादका जो उस पार । तुर्यावस्थाका मध्य घर । पर-ब्रह्म जो ॥ ७३ ॥ मोक्ष सह सभी गति । लेती है यहां विश्रांति । गंगादि नदीकी गति । जैसे समुद्र ॥ ७४ ॥ वह सुख इसी देहमें । मिलता है विपुलतामें । न होती भूत-वैषम्यमें । विषय-बुद्धि ॥ ७५ ॥ सभी दीप-ज्योतिमें जैसे । रहता तेज एक जैसे । रहता है सर्वत्र वैसे । ईश एक ॥ ७६ ॥ ऐसी सम-दृष्टिसे पार्थ ! । सदा सर्वत्र जो देखता । कभी आधीन नहीं होता । जन्म मरणके ॥ ७७ ॥
जो देखे प्रभु सर्वत्र भरा है सम जो स्वयं । आत्माकी न करे हिंसा पाता है गति उत्तम ॥ २८ ॥ (66) ५२१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग