ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसीलिये वह भाग्यवान । ऐसे करते हम वर्णन । साम्य-सेज पर है नयन । लगे हैं उसके ॥ ७८ ॥ प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः यःपश्यति तथात्मानमकर्त्तारं सपश्यति ॥ २९ ॥ मन बुद्धि जिसमें प्रमुख । ज्ञान औ' कर्मेंद्रिय अशेष । करती है जो प्रकृति देख । जानता वह सत्व ॥ ७९ ॥ गृह-निवासी सभी करता । घर कुछ भी नहीं करता । बादल आकाशमें दौड़ता । आकाश रहता स्थिर ॥ १०८० ॥ वैसी ही प्रकृति आत्म-प्रभा । गुण-क्रीडासे विविधारंभ । आत्मा रहता है जैसे स्तंभ । यह न जानते ॥ ८१ ॥ ऐसा जो यह् निर्णय । जिसमें हुवा उदय । उसने जाना निश्चय । अकर्त्तापन ॥ ८२ ॥ यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ ३० ॥ वैसे सहज अर्जुन । होगा ब्रह्मत्व संपन्न । भूताकृति है जो भिन्न । दीखेगी एकमें ॥ ८३ ॥ लहर जैसे सलील पर । परमाणु-कण स्थल पर । किरण-जाल आकाश पर । भास्करका ॥ ८४ ॥ या देहमें अवयव । मनमें संपूर्ण भाव । विस्फुलिंग सावयव । एक अग्निके ॥ ८५ ॥ करनेसे प्रकृतीके होते हैं कर्म जो सब । अकर्ता है स्वयं आत्मा यथार्थ यह देखना ॥ २९ ॥ जुड़ा एकत्वमें देखे भूतोंकी भिन्नता सब । उसीसे जान विस्तार पाता ब्रह्मत्व है तभी ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी ५२२