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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

वह नाम मात्रका है पुरुष । नहीं नर नारी जो नपुंसक । अथवा मानो नहीं जाने एक । क्या है निश्चित ॥ ८१ ॥ वह है अचक्षु अश्रवण । तथा जो अ-हस्त अ-चरण । जिसका नहीं रूप औ' वर्ण । नाम भी नहीं ॥ ८२ ॥ जहां कुछ भी नहीं है पार्थ । देखती वहां प्रकृति भर्ता । इससे उसे भोगना होता । सुख दुःख ॥ ८३ ॥ वह है जो अकर्ता । उदास औ' अभोक्ता । किंतु है पतिव्रता । भोगती है ॥ ८४ ॥ उसके गुण-रूपका मेल । कर दिखाता है बड़ा खेल । दिखाती झांकी वह केवल । धनुर्धर ॥ ८५ ॥ इस प्रवृत्तिको यहां अब । गुण-मयी कहते हैं सब । अथवा वह गुणोंकी सब । मूर्ति ही है ॥ ८६ ॥ प्रति-पलमें यह नित्य-नूतन । दिखाती है गुणोंका रंग अर्जुन । जिससे जड़ भी उन्मादित मन । होते उन्मत्त ॥ ८७ ॥ यही है नामको प्रसिद्ध । करती है स्नेहसे स्निग्ध । होती हैं इंद्रियां प्रबुध्द । इससे ही ॥ ८८ ॥ अजी ! कहते हैं मन नपुंसक । किंतु भोगती वह तीनो लोक । ऐसे ऐसे हैं इसके अलौकिक । करतूत सारे ॥ ८९ ॥ भ्रमका यह महा-द्वीप । व्याप्तिका है सुंदर रूप । विकार इसके अमाप । सभी प्रकारके ॥ ९९० ॥ यह है कामकी मांडवी । मोह-वनकी जो माधवी । इसको कहते हैं “देवी- । माया” है यह ॥ ९१ ॥ यह है वाङ्मयका विस्तार । नाम-रूप करती साकार । प्रपंच जाल जो निरंतर । फैलती अभंग ॥ ९२ ॥ कालकी है यही जाया । विद्याको इसने किया । इच्छा ज्ञान तथा क्रिया । इसीसे जान ॥ ९३ ॥ ५१३ (65) क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

यह है नादका टंकसाळ । सकल चमत्कारका स्थल । अथवा करती सब खेल । अखिल विश्वका ॥ ९४ ॥ उत्पत्ति प्रलय जो पार्थ । इसके सब सायं-प्रात । यह सब अति अद्भुत । मोहका सारा ॥ ९५ ॥ अद्वयकी दूसरी मूर्ति । मानो निःसंगकी साथी । शून्यके घरमें वस्ति । धनंजय ॥ ९६ ॥ उसका है पांडुकुमार । सौभाग्य-व्याप्तिका विस्तार । अनावृत पुरुष पर । डालती आवरण ॥ ९७ ॥ सदा है वह निर्विकार । बनती उसके विकार । वहां यह सब प्रकार । बनती आप ॥ ९८ ॥ उस स्वयंभूकी है उत्पत्ति । उस अमूर्तकी जो है मूर्ति । तथा बनती स्थिति-प्रकृति । स्वयं आप ॥ ९९ ॥ उस अनार्तकी यह आर्त । तथा पूर्णत्वकी यह तृप्त । उस अकुलकी जात-गोत । बनती यही ॥ १००० ॥ अवर्णनीयका वर्णन । उस अपारका प्रमाण । तथा उस अमनस्कका मन । बुद्धि भी बनती ॥ १ ॥ उस निराकारका आकार । तथा निष्व्यापारका व्यापार । निरहंकारका अहंकार । बन बैठती है ॥ २ ॥ उस अनामका नाम । तथा अजन्मका जन्म । स्वयं होती यह कर्म- । क्रिया उसकी ॥ ३ ॥ उस निर्गुणके गुण । अ-चरणके चरण । अ-श्रवणके श्रवण । अ-चक्षुके चक्षु ॥ ४ ॥ उस भावातीतका है भाव । निरवयवके अवयव । अथवा बनती है सर्व । उस पुरुषका ॥ ५ ॥ इस भांति यह प्रकृति । बढाकर अपनी व्याप्ति । विकृति जालमें फंसाती । अविकारीको ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ५१४

यहां जो पुरुषत्व होता । प्रकृति कारण बनता । अमावास्यमें रहता । चन्द्रमा जैसे ॥ ७ ॥ जैसे अति-स्वच्छ सुवर्ण । मिलकर जस्तके कण । बनता जाता है जो हीन । उसी भांति ॥ ८ ॥ या बनता जैसे सज्जन । पिशाच-संगसे है हीन । बादल व्याप्त हो गगन । दुर्दिन करता ॥ ९ ॥ या पय होता पशुके स्तनमें । अथवा अग्नि होता लकडीमें । तथा लपेट लिया है वस्त्रमें । नंदादीप ॥ १०१० ॥ जब होता राजा पराधीन । तथा सिंह रोगके आधीन । वैसे पुरुषत्व तेज-हीन । होता प्रकृतिमें ॥ ११ ॥ जगता हुवा मनुष्य जैसे । यकायक निद्रित होनेसे । स्वप्नमें दुःख भोगता वैसे । यहां वह ॥ १२ ॥ वैसे प्रकृतिके आधीन । भोगता है पुरुष गुण । जैसे विरक्त स्त्री-आधीन । उखडता है ॥ १३ ॥ वैसे ही अज नित्यका जो होता । जन्म-मृत्यु सहना पडता । प्रकृति-गुण संगसे होता । सभी यह ॥ १४ ॥ किंतु यह जैसे पांडुसुत । तप्त लोहपे होता आघात । तब अग्निको होते हैं घान । मानते वैसे ॥ १५ ॥ या आंदोलनसे उदक । प्रतिभा होती है अनेक । उसे कहे नानात्व लोक । चंद्रका जैसे ॥ १६ ॥ या पास होनेसे दर्पण । एकके दो दीखते आनन । या कुंकुमसे रक्त-वर्ण । आता स्फटिकमें ॥ १७ ॥ गुण संगसे ऐसा होता । अजन्मा है जनम लेता । ऐसा यह आभास होता । अन्यथा नहीं ॥ १८ ॥ अधमोत्तम योनि वैसे । मानते हैं इसको ऐसे । संन्यासी स्वप्नमें ही जैसे । बनता अंत्यज ॥ १९ ॥ ५१५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

इसलिये केवल पुरुष । नहीं भोगता है कुछ देख । यहां गुण-संग ही अशेष । लगता मूलमें ॥ १०२० ॥ उपद्रष्टानुमंता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२ ॥ अजी ! यह खड़ा है प्रकृतिमें । आधार-स्तंभसा लता बीचमें । अंतर जो है धरणी नभमें । वही इनमें है ॥ २१ ॥ तीरमें प्रकृति सरिताके । खडा मेरु-सा बन करके । प्रवाहमें स्थिर है इसके । प्रतिबिंब मात्र ॥ २२ ॥ प्रकृति होती है प्रवाहित । स्थिर रहता यह सतत । तभी इसमें होता शासित । ब्रह्मांड सारा ॥ २३ ॥ प्रकृति है इससे ही जीवित । इसकी सत्तासे ही वस्तुजात । प्रसवती तभी है यह कांत । होता प्रकृतिका ॥ २४ ॥ अनंत-कालसे अर्जुन । सृष्टि होती यह उत्पन्न । तथा होती इसीमें लीन । कल्पांतमें ॥ २५ ॥ तभी है यह प्रकृतिका ईश । ब्रह्मांडका सूत्रधार विशेष । इसे तोलता रहता अशेष । पांडुकुमार ॥ २६ ॥ अजी ! सुन इस शरीरमें । परमात्म है ऐसे बोलनेमें । आता है जो इसीके विषयमें । जान ले तू ॥ २७ ॥ प्रकृतिके उस पार एक । कोई है कहते सभी देख । वह यही परम पूरुष । जान तत्वतः ॥ २८ ॥ य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥ सर्व-साक्षी अनु-ज्ञाता भर्ता भोक्ता महेश्वर । कहते परमात्मा है देहमें पर- पूरुष ॥ २२ ॥ ऐसा पुरुषका रूप प्रकृतिका गुणात्मक जानता जो यह ऐसा न कभी जन्मता फिर ॥ २३ ॥ गी ५१६ ज्ञानेश्व

जिसने यह जान लिया वह मुक्त है— पुरुषका जो शुद्ध-रूप । संपूर्ण जानता है आप । प्रकृतिके क्रिया कलाप । गुण हैं सारे ॥ २९ ॥ यह रूप तथा यह छाया । यह जल तथा यह माया । करना निर्णय धनंजय । ऐसा सभी ॥ १०३० ॥ इस प्रकारसे अर्जुन । प्रकृति पुरुष विवेचन । स्पष्ट करता जिसका मन । सदा सर्वत्र ॥ ३१ ॥ शरीरसे रखके मेल । करता है कर्म सकल । रहता नभसा निर्मल । असंग हो ॥ ३२ ॥ देहमें वह ऐसा रहता । देह-मोहसे नहीं भ्रमता । देह-पातपे नहीं जन्मता । फिरसे वह ॥ ३३ ॥ होता है जब यह एक । प्रकृति पुरुष विवेक । तब करता अलौकिक । महदुपकार ॥ ३४ ॥ यह विवेक-भानुके समान । उजलायेगा अंतःकरण । उसके उपाय अनेक सुन । कहता हूं मैं ॥ ३५ ॥ ध्यानेनात्मनि पश्यंति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥ आत्मानात्म विवेक-साधनका उपाय— सुन तू अर्जुन कई एक । विचार-रूपी अग्निमें रख । हीन कसका जो सुवर्णक । पुट देकर ॥ ३६ ॥ जलाते सभी सैंतीस । अनात्म-भेद सर्वस । चुनते हैं शुद्ध-शेष । आत्म-तत्व ॥ ३७ ॥ अपने ही हियमें उसे । देखते अपनी दृष्टिसे । आप ही सदा अपनेसें । पांडुकुमार ॥ ३८ ॥ ध्यानसे देखता कोई आत्माको हियमें स्वयं । सांख्य-योग तथा कोई पाते हैं कर्म-योगसे ॥ २४ ॥ ५१७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

और कुछ दैव-योगसे । चित्त देते सांख्य-योगसे । और कुछ कर्माचरणसे । देखते वह तत्व ॥ ३९ ॥ अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते । तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥ ऐसे सुन पांडुकुमार । तर जाते भव-भंवर । पाके कुछ अन्य प्रकार । भली भांतिसे ॥ १०४० ॥ तब वह ऐसा करते । अभिमान सभी तजते । गुरुपे विश्वास रखते । पूर्ण-रूपसे ॥ ४१ ॥ हित अहित सब देखते । हानि देख दयासे भरते । जानकर दुःख भी हरते । तथा देते हैं सुख ॥ ४२ ॥ उनके मुखसे जो शब्द निकलते । सब वे अति-आदरसे सुनते । तथा तन मनसे वैसे ही बनते । पांडुकुमार ॥ ४३ ॥ सुननेके लिये ही केवल । करते हैं कर्तव्य सकल । शब्द पर निष्ठासे अचल । होते निछावर ॥ ४४ ॥ सुन तू यह धनंजय । मरणार्णवसे निर्भय । निकलते हो अमृतमय । भली भांति ॥ ४५ ॥ जाननेके हैं अनेक । उपाय यहां हैं देख । उससे जानना एकं । परम तत्व ॥ ४६ ॥ कोई भाग्यवान ही विश्वकी विविधतामें एकता देख सकता है— अब हुआ यह बहुत । किंतु सर्वार्थका मथित । सिद्धांत तत्व-नवनीत । देता हूं तुझे ॥ ४७ ॥ स्वयं न जानके कोई बड़ोंसे सुनके सब । तरते मृत्युको वे भी श्रद्धासे कर वर्तन ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ५१८

इससे होगा सहज । अनुभव तुझे आज । यह होने पर तुझ । न होगा सायास ॥ ४८ ॥ इसीलिये शुद्ध-प्रज्ञासे कर । सिद्धांतकी रचना सुंदर । पाखंडकी पूरी खंडना कर । कहता फलितार्थ ॥ ४९ ॥ यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥ क्षेत्रज्ञ क्या यह समझाया । अपना रूप तुझे दिखाया । तथा क्षेत्र भी सब समझाया । संपूर्ण रूपसे ॥ १०५० ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका यह मिलन । करता भूत-मात्रको उत्पन्न । जैसे सलिल अनिल मिलन । रचते तरंग ॥ ५१ ॥ अथवा जब दिनकरके किरण । करते ऊसर भूमिका आलिंगन । होता है मृगजल-पूर-सा दर्शन । धनंजय ॥ ५२ ॥ अथवा वर्षाकी धारासे । भीगी हुयी धरणीमेंसे । अंकुर नाना प्रकारसे । निकलते अनेक ॥ ५३ ॥ वैसे चराचर संपूर्ण । जीव-जगतका निर्माण । करता उभय मिलन । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ॥ ५४ ॥ इसीलिये हे अर्जुन । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञसे भिन्न । नहीं है कोई जान । साकार वस्तु ॥ ५५ ॥ समं सर्वेषुभूतेषु तिष्ठंतं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यंतं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥ विश्वमें उत्पन्न जो जो होते स्थावर जंगम । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ संयोग यही कारण जान तू ॥ २६ ॥ समान सब भूतोंमें रहा है परमेश्वर । अनाशी नाशवंतोंमें जो देखे वह देखता ॥ २७ ॥ ५१९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

जैसे पटत्व नही है तंतु । किंतु पटका आधार तंतु । यह प्रज्ञा-दृष्टिसे जान तू । ऐक्य भाव ॥ ५६ ॥

सब भूतोंका आधार । एक ही है तत्व-सार । दीखते भिन्न आकार । देखनेमें ॥ ५७ ॥

इनके नाम अनेक । व्यवहार भी अनेक । तथा रूप भी अनेक । दीखते हैं ॥ ५८ ॥

देख कर यह अर्जुन । करेगा द्वैत-भाव मन । मुक्त होना अवश्य जान । जन्म-मरणसे ॥ ५९ ॥

जैसे अनेक कारणसे । लगते नाना आकारसे । लतामें अगणित जैसे । फल कुमडेके ॥ १०६० ॥

अथवा बेरकी जो लकडी । सरल हो अथवा हो टेढी । वस्तु एक है खडी या पडी । वैसे वह तत्व ॥ ६१ ॥

जैसे अग्निकण अनेक । उसकी दाहकता एक । वैसे जीव-राशि अनेक । एक परतत्व ॥ ६२ ॥

वर्षाधार गगन भर । उसमें एक ही है नीर । वैसे हे नाना भूताकार । सबमें ईश एक ॥ ६३ ॥

भूतग्राम सब विषम । सबमें वस्तु एक सम । घर घरमें होता व्योम । एकसा जैसे ॥ ६४ ॥

नाश होने पर भूताभास । आत्मा होता एक अविनाश । जैसे अलंकार है विशेष । उसमें एक स्वर्ण ॥ ६५ ॥

जैसे जीव-धर्म हीन । तथा जीवसे अभिन्न । देखता जो सु-नयन । ज्ञानियोंमें ॥ ६६ ॥

ज्ञान-दृष्टिमें अर्जुन । होता है जो सु-नयन । वही बडा भाग्यवान । नहीं यह बढा ॥ ६७ ॥

ज्ञानेश्वरी ५२०

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥ गुणेंद्रियोंकी जो धोकटी । देह-धातुओंकी त्रिपुटी । पंच मेलकी यह पटी । दारुण है सब ॥ ६८ ॥ पांच डंकोंका है यह वृश्चिक । अथवा पंचाग्नि ताप-दायक । अथवा मृगकी मांद है एक । मिली वन-राजको ॥ ६९ ॥ शरीरमें रहकर ऐसे । नित्य-भावकी तलवारसे । अनित्यताका उदर कैसे । नहीं फाडता ॥ १०७० ॥ ज्ञानीका गंतव्य, जहां मोक्ष भी विश्रांति लेता है— किंतु इस देहमें रहकर । न करता अपने प्रहार । तथा अवसानपे धनुर्धर । मिलता मुझमें ॥ ७१ ॥ अनेक जन्मोंको पार कर । योग-ज्ञानका सहारा लेकर । योगी जन डुबकी लगाकर । बैठते यहां ॥ ७२ ॥ आकारका जो पैल तीर । नादका जो उस पार । तुर्यावस्थाका मध्य घर । पर-ब्रह्म जो ॥ ७३ ॥ मोक्ष सह सभी गति । लेती है यहां विश्रांति । गंगादि नदीकी गति । जैसे समुद्र ॥ ७४ ॥ वह सुख इसी देहमें । मिलता है विपुलतामें । न होती भूत-वैषम्यमें । विषय-बुद्धि ॥ ७५ ॥ सभी दीप-ज्योतिमें जैसे । रहता तेज एक जैसे । रहता है सर्वत्र वैसे । ईश एक ॥ ७६ ॥ ऐसी सम-दृष्टिसे पार्थ ! । सदा सर्वत्र जो देखता । कभी आधीन नहीं होता । जन्म मरणके ॥ ७७ ॥

जो देखे प्रभु सर्वत्र भरा है सम जो स्वयं । आत्माकी न करे हिंसा पाता है गति उत्तम ॥ २८ ॥ (66) ५२१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

इसीलिये वह भाग्यवान । ऐसे करते हम वर्णन । साम्य-सेज पर है नयन । लगे हैं उसके ॥ ७८ ॥ प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः यःपश्यति तथात्मानमकर्त्तारं सपश्यति ॥ २९ ॥ मन बुद्धि जिसमें प्रमुख । ज्ञान औ' कर्मेंद्रिय अशेष । करती है जो प्रकृति देख । जानता वह सत्व ॥ ७९ ॥ गृह-निवासी सभी करता । घर कुछ भी नहीं करता । बादल आकाशमें दौड़ता । आकाश रहता स्थिर ॥ १०८० ॥ वैसी ही प्रकृति आत्म-प्रभा । गुण-क्रीडासे विविधारंभ । आत्मा रहता है जैसे स्तंभ । यह न जानते ॥ ८१ ॥ ऐसा जो यह् निर्णय । जिसमें हुवा उदय । उसने जाना निश्चय । अकर्त्तापन ॥ ८२ ॥ यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ ३० ॥ वैसे सहज अर्जुन । होगा ब्रह्मत्व संपन्न । भूताकृति है जो भिन्न । दीखेगी एकमें ॥ ८३ ॥ लहर जैसे सलील पर । परमाणु-कण स्थल पर । किरण-जाल आकाश पर । भास्करका ॥ ८४ ॥ या देहमें अवयव । मनमें संपूर्ण भाव । विस्फुलिंग सावयव । एक अग्निके ॥ ८५ ॥ करनेसे प्रकृतीके होते हैं कर्म जो सब । अकर्ता है स्वयं आत्मा यथार्थ यह देखना ॥ २९ ॥ जुड़ा एकत्वमें देखे भूतोंकी भिन्नता सब । उसीसे जान विस्तार पाता ब्रह्मत्व है तभी ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी ५२२

वैसे एकके भूताकार । दृष्टिगत होंगे साकार । ब्रह्म-संपत्ति भांडार । लगेगा हाथ ॥ ८६ ॥ सर्वत्र सब तुझे अर्जुन । होगा पर-ब्रह्मका दर्शन । तथा अभयादि समाधान । मिलेगा तब ॥ ८७ ॥ इस भांति यह जो पार्थ । प्रकृति-पुरुष व्यवस्था । करलें प्रतीति सतत । चाहे वैसे वे ॥ ८८ ॥ अब तू कर वह प्रतीति । चित्तमें स्थिरकर निश्चिति । अब नहीं तो सुभद्रापति । तो नंतर कुछ ॥ ८९ ॥ मिला है कुल्ला करने अमृत । अथवा भांडार हुवा लक्षित । ऐसा मिला यह लाभ निश्चित । ज्ञान-रहस्य ॥ १०९० ॥ कहूंगा अब दो बोल । अति-गूढ अनमोल । चित्त देकर सकल । सुन तू वे ॥ ९१ ॥ श्रीकृष्णका यह बोल । सुनता पार्थ निश्चल । इंद्रियां तब केवल । करके कान ॥ ९२ ॥ अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥ आत्मा और शरीरकी तुलना तथा संबंध— अजी ! परमात्मा जो कहलाता । जलमें बिंबित हो न भीगता । जैसा सूर्य वैसा वह रहता । प्रकृतिमें निर्लेप ॥ ९३ ॥ जलके आदि और अंत । रहता है सूर्य सतत । केवल है वह बिंबित । अन्योंकी दृष्टिसे ॥ ९४ ॥ आत्मा वैसे देहमें होता कहां । रहता है वह जहांका तहां । कहा जाता है देहमें रहता वहां । नहीं है सत्य ॥ ९५ ॥ अव्ययी परमात्मा है तथा अनादि निर्गुण । देहमें रहके पार्थ करता लीपता नहीं ॥ ३१ ॥ ५२३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

दर्पणमें मुख जैसे । बिंबित है यह वैसे । रहता देहमें वैसे । आत्म-तत्त्व ॥ ९६ ॥ संबंध जो देह-आत्मका । सर्वथा निर्जीव बातका । होता क्या बात औ' रेतिका । संबंध पार्थ ॥ ९७ ॥ आग तथा पंखमें जैसे । नत्थी करना कहो कैसे । या पत्थरको आकाशसे । कैसे जोडना ॥ ९८ ॥ एक जाता पूर्वकी ओर । दूसरा पश्चिमकी ओर । भेंट होती कैसी आखर । दोनोंकी पार्थ ॥ ९९ ॥ प्रकाश और अंधार । निर्जीव सजीव नर । तथा आत्मा औ' शरीर । एक समान ॥ ११०० ॥ रात्र और दिवस । कनक औ' कपास । नाता कैसा है वैसा । इन दोनोंका ॥ १ ॥ देह यह है पांचोंका जाल । गुण-कर्मकी गांठ केवल । जन्म-मृत्यु चक्र पर डाल । घुमाई जाती है ॥ २ ॥ कुंडमें जैसे कालानलके । गोले पडे हैं नवनीतके । हिलनेमें ही पांव माखिके । जाते पिघल ॥ ३ ॥ पडनेसे यह आगमें । भस्म हो उडता क्षणमें । जानेसे श्वान उदरमें । होता है मल ॥ ४ ॥ इन दोनोंसे यदि चूकता । कृमियोंका पुंज बनता । इसका परिणाम है पार्थ । कल्मष ही है ॥ ५ ॥ इस देहकी यह दशा । तथा आत्मा है वह ऐसा । नित्य-शुद्ध-सिद्ध एकसा । अनादित्वसे ॥ ६ ॥ सकल नहीं है या यह निष्कल । न अक्रिय या यह क्रिया-शील । नहीं यह कृश अथवा स्थूल । निर्गुणत्वसे ॥ ७ ॥ आभास नहीं या निराभास । प्रकाश नहीं या अप्रकाश । न अल्प अथवा बहुवस । अरूपतासे ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ५२४

जो न रीता या भरित । न रहित या सहित । मूर्त नहीं या अमूर्त । शून्यत्वसे ॥ ९ ॥ जो न आनंद या निरानंद । न है एक अथवा विविध । न है जो मुक्त अथवा बद्ध । आत्मत्वसे ॥ ११० ॥ न वह इतना या उतना । न स्वत सिद्ध या न है बना । न है वक्ता अथवा मौन । अलक्षत्वसे ॥ ११ ॥ सृष्टि-साथ यह नहीं बनता । या प्रलयके साथ न नाशता । होने न होनेसे परे रहता । लय स्थान जो ॥ १२ ॥ अगणित अथवा अचर्चित । मिटता न होता वृद्धिगत । न घटता न होता विकृत । अव्यवत्वसे ॥ १३ ॥ इस भांति है यह आत्मा । देहमें कहते प्रियोत्तम । मवाकाशमें जैसे व्योम । नाम जिसका ॥ १४ ॥ ऐसे उस अखंड पर । बनते देहके आकार । वह न ले या तजकर । रहता सहज ॥ १५ ॥ आत्मा शरीरमें रहकर भी न कुछ करता न लीपता— जैसे प्रकाश और अंधकार । आते जाते आकाशपर । शरीर है आत्म-तत्व ˙पर । इसी भांति ॥ १६ ॥ इस देहमें न कुछ करता । अथवा वह न कुछ कराता । सहज व्यापारमें न गूंथता । कर्त्ता पनसे ॥ १७ ॥ इसीलिये वह स्वरूपसे । अल्पता अथवा पूर्णतासे । न लीपता है कभी देहसे । देहमें भी ॥ १८ ॥ यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥ आकाश ज्यों सर्व-व्यापी न लीपे सूक्ष्म होकर । व्याप्त सर्वत्र त्यों आत्मा देहमें लीपता नहीं ॥ ३२ ॥ ५२५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

यह आकाश नहीं कहां। कब वह न घुसता कहां । सर्वत्र रहता जहां तहां । किंतु निर्लिप्त ॥ १९ ॥ वैसा सदैव वह शरीरगत । रहता है आत्मा सर्वत्र सतत । किंतु नहीं होता वह कभी लिप्त । क्षेत्र दोषसे ॥ १२० ॥ लक्षण यह पुनः पुनः । जानना सदा सत्य मान । सर्वगत क्षेत्र-विहीन । क्षेत्रज्ञका तू ॥ २१ ॥ यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥ लोहेको चुंबक हिलात । लोहा चुंबक नहीं होता । क्षेत्र क्षेत्रज्ञका होता । इस भांतिसे ॥ २२ ॥ दीप-ज्योति निरंतर । चलाती घरका व्यापार । इन दोनोंका है अंतर । अमर्याद ॥ २३ ॥ काठमें रहती है आग । किंतु काठ न होता आग । ऐसे दोनों होते अलग । देह और आत्मा ॥ २४ ॥ आकाश और बादल । सूर्य तथा मृगजल । ऐसा भेद तू निश्चल । यदि देखेगा ॥ २५ ॥ जैसा आकाशमें एक । रहता है वह अर्क । प्रकाशता तीन लोक । नित्य नित्य ॥ २६ ॥ ऐसा क्षेत्रज्ञ है एक । क्षेत्र पूर्ण प्रकाशक । न यह संवेद्य-जनक । न प्रक्षेप्यार्थ भी ॥ २७ ॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यांति ते परम् ॥ ३४ ॥ जैसे है एक ही सूर्य उजळाता भुवनत्रय । वैसे प्रकाशता क्षेत्र क्षेत्रज्ञ पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञका भेद देखते ज्ञान-दृष्टिसे । पाते वे मोक्षका धाम भूत-प्रकृति लांघके ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५२६

आत्मानात्म-व्यवस्थाके राजहंस— शब्द-तत्व सारज्ञ । दीखता है जो प्राज्ञ । क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ । इनमें भेद ॥ २८ ॥ इन दोनोंका जो अंतर । देखता है वही चतुर । वे ज्ञानियोंका महा-द्वार । रहते नित्य ॥ २९ ॥ इसीलिये जो सुमति । जोड़ते शांति-संपत्ति । शास्त्रोंकी सदा दुभति । पालते घरमें ॥ ११३० ॥ भोगके आकाश पर । साहस युत संचार । करते जो धनुर्धर । इसी आशासे ॥ ३१ ॥ शरीरादि जो समस्त । मानकर तृणवत । लेते संत-सेवा व्रत । जीव-भावसे ॥ ३२ ॥ करके ऐसे प्रकार । अनेक सायास कर । होते हैं चितमें स्थिर । ज्ञान-भावसे ॥ ३३ ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका जो अंतर । देखते रहते निरंतर । करते हैं हम न्योच्छावर । अपना ज्ञान उनपे ॥ ३४ ॥ तथा महा-भूतादिक । प्रभेद लेके अनेक । फैली है अवास्तविक । प्रकृति है जो ॥ ३५ ॥ वह शुक-नलिका-न्यायसे । न चिपके ही चिपकी वैसे । मानता है जो जैसेको वैसे । यह धनुर्धर ॥ ३६ ॥ जैसे माल ही है माल । देखती आंखें निर्मल । सर्प-भ्रमको चंचल । दूर करके ॥ ३७ ॥ अथवा शुक्तिको शुक्ति । करता है सही प्रतीति । छोडकर रजत-भ्रांति । सहज भावसे ॥ ३८ ॥ आत्म-प्रकृतिकी जो है भिन्नता । उसको हृदयसे जो जानना । उसे मैं पर-ब्रह्म ही कहता । पांडुकुमार ॥ ३९ ॥ ५२७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

आकाशसे भी जो महान । अव्यक्तका पैल-तीर मान । पाके उसे साम्या-साम्य-भान । नहीं रहता ॥ ११४० ॥ आकार वहां मिटता । जीवत्व सभी घुलता । द्वैत-नाम भी खो जाता । वह है अद्वय ॥ ४१ ॥ परम-तत्व वे पार्थ । होते हैं वहां सर्वथा । आत्म-अनात्म-व्यवस्था । उसके वे राजहंस ॥ ४२ ॥ तेरहवे अध्यायका उपसंहार— इस भांति यह संपूर्ण । पांडवको वह श्रीकृष्ण । देता ज्ञान हो स-करुण । जीवनका सब ॥ ४३ ॥ एक कलशमें रहता जो जल । दूसरेमें डालते जैसे सकल । वैसे श्रीकृष्णने दिया सकल । ज्ञान पार्थको ॥ ४४ ॥ तथा किसको देगा कौन । वह है नर-नारायण । फिर अर्जुनको श्रीकृष्ण । कहाता मैं यह ॥ ४५ ॥ रहने दो यह सकल । बिना प्रइनके बोल । अपना सर्वस सकल । दिया श्रीहरिने ॥ ४६ ॥ अगले अध्यायकी भूमिका— किंतु मनमें वह अर्जुन । अब तक तृप्ति नहीं मान । अधिकाधिक इच्छा महान । बढाते रहा ॥ ४७ ॥ स्नेहसे भरी ज्योति । जैसे बढते जाती । ऐसे श्रवण-भक्ति । बढी पार्थकी ॥ ४८ ॥ जहां सु-गृहिणी उदार । रसज्ञ औ' भोजनहार । मिले जब बढता कर । उसी भांति ॥ ४९ ॥ उभर आया श्रीकृष्णका मन । देखकर उल्हसित अर्जुन । उमड अया तब प्रवचन । छलकता हुवा ॥ ११५० ॥ सु-वायुसे मेघ उमड़ता । चंद्रमासे सिंधु उमड़ता । वक्तृतामें रस भर आता । श्रोताके आदरसे ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी · ५२८

आनंदमय अब संपूर्ण । करेगा जगतको श्रीकृष्ण । राजन् ! करें उसको श्रवण । कहता संजय ॥ ५२ ॥ महाभारतमें इस प्रकार । श्रीव्यासने जो प्रतिभा-सागर । शांति-कथा गायी है जो अमर । भीष्म-पर्वमें ॥ ५३ ॥ वह कृष्णार्जुन संवाद । देश-भाषामें मैं विशद । कह दिखलाऊंगा प्रबंध । ओवी छंदमें ॥ ५४ ॥ केवल वह शांति-कथा । चलेगी शब्दका वाक्पथ । पग रख श्रृंगार माथा- । पर अबिरल ॥ ५५ ॥ देशीके बोल सुंदर । सजायेंगे अलंकार । लजायेंगे जो मधुर । अमृतको यहां ॥ ५६ ॥ उन शब्दोंका जो शांति-गुण । दिखाएगा चंद्रमा है उष्ण । करेगा रसना लुबुधन । नादका लोप ॥ ५७ ॥ इससे पिशाचका भी मन । बनेगा सात्विकताकी खान । श्रवण-मात्रसे है सुमन । पायेगा समाधि ॥ ५८ ॥ वाग्विलास बिस्तार कर । गीतार्थसे विश्वको भर । बांधेंगे विशाल मंदिर । इस जगतका ॥ ५९ ॥ मिटेगी न्यूनता विवेककी । सार्थकता हो कान-मनकी । खुलेगी खान ब्रह्म-विद्याकी । चाहे जिसको ॥ ११६० ॥ पर-तत्त्व देखें नयन । पाये सुख-वसंतोद्यान । आकंठ ब्रह्म रस पान । करे विश्व ॥ ६१ ॥ होगा सब यह साकार । ऐसा बोलूंगा मैं सुंदर । कृपासे किया है स्वीकार । मेरा श्रीगुरुने ॥ ६२ ॥ स्पष्ट शब्दार्थसे तब ऐसे । उपमादिके अधिकतासे । समझाऊं प्रति -पदमैसे । भावार्थ-सार ॥ ६३ ॥ मेरे गुरुवर श्रीमंत । पूर्ण-बोधसे विद्यावंत । किया मुझे हो कृपायुत । श्रीगुरुने ॥ ६४ ॥ ५२९ क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोग (67)

अबतक उस कृपासे । निकला जो मेरे मुखसे । मान्य हुवा आप सबसे । यहां गीतार्थ ॥ ६५ ॥ फिर आप संत चरण । देते हैं मुझको शरण । न रही है इसी कारण । कोई न्यूनता ॥ ६६ ॥ कभी क्या सरस्वर्तिका मूक । सहज भी होता है बालक । तथा न्यूनता क्या सामुद्रिक । महा-लक्ष्मीको ॥ ६७ ॥ ऐसे आप संतोंके पास । अज्ञानका कैसे वास । तभी मैं अब नव-रस । वर्षा करूंगा ॥ ६८ ॥ क्या कहूं अब गुरुवर । मुझे दे इक अवसर । ज्ञानदेव कहे सुंदर । कहूंगा गीतार्थ ॥ ६९ ॥ गीता श्लोक ३४ ज्ञानेश्वरी ओवी ११६९.

१४ गुणोत्कर्ष-गुण-निस्तारयोग आचार्य वंदना— जय जय आचार्य । समस्त गुरुवर्य । प्रज्ञा-प्रभात सूर्य । सुखोदय ॥ १ ॥ जय जय सर्व-विश्राम-स्थान । सोऽहं-भाव बोध-दाता महान । अनेक लोक-तरंग निदान । महा-समुद्र तू ॥ २ ॥ सुनिये आर्त-बंधू । सदा कारुण्य-सिंधू । विशद-विद्या- वधू । वल्लभाजी ॥ ३ ॥ जिनसे तू अदृश्य होता । उनको तू विश्व दिखाता । जिनसे तू प्रकट होता । तू ही सर्वस्व ॥ ४ ॥ कोई अन्योंकी दृष्टि चुराता । किंतु अपनेको है दीखता । तेरे लाघवकी कौतुकता । आपही अदृश्य ॥ ५ ॥ विश्वका सर्वस्व तू महान । किसे ज्ञान औ' किसे अज्ञान । ऐसा सहज लाघव-स्थान । नमन तुझको ॥ ६ ॥ विश्वमें जो सलिल द्रवित । तेरे द्रवसे है प्रवाहित । तुझसे ही सहन समर्थ । हुई पृथ्वी ॥ ७ ॥ रवि-चंद्रादि सिकता-कण । विश्वको दे प्रकाश-दान । तेरी ही दीप्तिके कारण । तेजका तेज तू ॥ ८ ॥ अनिलकी जो दृढ चल । उसकी नींव तेरा बल । गगनका जो चला खेल । तुझमें ही देव ॥ ९ ॥

अथवा जो अन्यथा ज्ञान । उसकी ज्योति आप जान । करना आपका वर्णन । श्रुतिको भी असाध्य ॥ १० ॥ जब तक न होता तेरा दर्शन । तब तक ही है वेदका वर्णन । दर्शन होने पर होते हैं मौन । हम और वेद ॥ ११ ॥ अजी ! एकार्णव-सिंधू । न जानता एक बिंदु । तभी नदी जाने गंध- । उसका कैसे ॥ १२ ॥ या उदय होते ही भास्वत । बन जाता है चंद्र खद्योत । वैसे ही हम श्रुति-सहित । बनते हैं मौन ॥ १४ ॥ अथवा मिट जाता जहां द्वैत । होता है परा पश्यंतिका अंत । तब होगा किस भांति वर्णित । किस भाषासे ॥ १४ ॥ इसीलिए छोड स्तवन । नम्रतासे होकर मौन । चरणमें करें नमन । यही भला है ॥ १५ ॥ जैसे हैं वैसे श्री गुरुवर । चरणमें करूं नमस्कार । सफल होनेमें वे आधार । ग्रंथ निरूपणमें ॥ १६ ॥ खोलकर अब कृपा-भांडार । मेरी बुध्दिकी झोली भरकर । मुझको काव्य-ज्ञान भी देकर । करें कृतार्थ ॥ १७ ॥ तब मैं विवेक-कर्ण-भूषण । चढाऊंगा संतोंको सुलक्षण । संभाल कर मैं अपने प्राण । तब प्रसादसे ॥ १८ ॥ गीतार्थका जो विधान । निकालेगा मेरा मन । उसे गुरु-कृपांजन । देना स्वामी ॥ १९ ॥ यह शब्द-सृष्टि सकल । दृष्टि देखेगी एक काल । वैसे उदय हो निर्मल । गुरु-कारुण्य बिंब ॥ २० ॥ मेरी प्रज्ञा-लतामें विशाल । लगे सरस काव्य-सु-फळ । वैसे वसंत बन स्नेहळ- । शिरोमणि देव ॥ २१ ॥ मति-गंगा-प्रवाह गंभीर । लेकर बहे प्रमेय-पूर । ऐसे उदार बरसा कर । मेरे स्वामी ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ५३२