ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआत्मानात्म-व्यवस्थाके राजहंस— शब्द-तत्व सारज्ञ । दीखता है जो प्राज्ञ । क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ । इनमें भेद ॥ २८ ॥ इन दोनोंका जो अंतर । देखता है वही चतुर । वे ज्ञानियोंका महा-द्वार । रहते नित्य ॥ २९ ॥ इसीलिये जो सुमति । जोड़ते शांति-संपत्ति । शास्त्रोंकी सदा दुभति । पालते घरमें ॥ ११३० ॥ भोगके आकाश पर । साहस युत संचार । करते जो धनुर्धर । इसी आशासे ॥ ३१ ॥ शरीरादि जो समस्त । मानकर तृणवत । लेते संत-सेवा व्रत । जीव-भावसे ॥ ३२ ॥ करके ऐसे प्रकार । अनेक सायास कर । होते हैं चितमें स्थिर । ज्ञान-भावसे ॥ ३३ ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका जो अंतर । देखते रहते निरंतर । करते हैं हम न्योच्छावर । अपना ज्ञान उनपे ॥ ३४ ॥ तथा महा-भूतादिक । प्रभेद लेके अनेक । फैली है अवास्तविक । प्रकृति है जो ॥ ३५ ॥ वह शुक-नलिका-न्यायसे । न चिपके ही चिपकी वैसे । मानता है जो जैसेको वैसे । यह धनुर्धर ॥ ३६ ॥ जैसे माल ही है माल । देखती आंखें निर्मल । सर्प-भ्रमको चंचल । दूर करके ॥ ३७ ॥ अथवा शुक्तिको शुक्ति । करता है सही प्रतीति । छोडकर रजत-भ्रांति । सहज भावसे ॥ ३८ ॥ आत्म-प्रकृतिकी जो है भिन्नता । उसको हृदयसे जो जानना । उसे मैं पर-ब्रह्म ही कहता । पांडुकुमार ॥ ३९ ॥ ५२७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग