ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह आकाश नहीं कहां। कब वह न घुसता कहां । सर्वत्र रहता जहां तहां । किंतु निर्लिप्त ॥ १९ ॥ वैसा सदैव वह शरीरगत । रहता है आत्मा सर्वत्र सतत । किंतु नहीं होता वह कभी लिप्त । क्षेत्र दोषसे ॥ १२० ॥ लक्षण यह पुनः पुनः । जानना सदा सत्य मान । सर्वगत क्षेत्र-विहीन । क्षेत्रज्ञका तू ॥ २१ ॥ यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥ लोहेको चुंबक हिलात । लोहा चुंबक नहीं होता । क्षेत्र क्षेत्रज्ञका होता । इस भांतिसे ॥ २२ ॥ दीप-ज्योति निरंतर । चलाती घरका व्यापार । इन दोनोंका है अंतर । अमर्याद ॥ २३ ॥ काठमें रहती है आग । किंतु काठ न होता आग । ऐसे दोनों होते अलग । देह और आत्मा ॥ २४ ॥ आकाश और बादल । सूर्य तथा मृगजल । ऐसा भेद तू निश्चल । यदि देखेगा ॥ २५ ॥ जैसा आकाशमें एक । रहता है वह अर्क । प्रकाशता तीन लोक । नित्य नित्य ॥ २६ ॥ ऐसा क्षेत्रज्ञ है एक । क्षेत्र पूर्ण प्रकाशक । न यह संवेद्य-जनक । न प्रक्षेप्यार्थ भी ॥ २७ ॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यांति ते परम् ॥ ३४ ॥ जैसे है एक ही सूर्य उजळाता भुवनत्रय । वैसे प्रकाशता क्षेत्र क्षेत्रज्ञ पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञका भेद देखते ज्ञान-दृष्टिसे । पाते वे मोक्षका धाम भूत-प्रकृति लांघके ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५२६